सऊदी अरब पर हमले से खुली 'मक्का पैक्ट' की पोल, पाकिस्तान बोला- यह केवल 'डिफेंसिव' है; युद्ध में उतरने से खींचे हाथ

सऊदी अरब पर हमले से खुली 'मक्का पैक्ट' की पोल, पाकिस्तान बोला- यह केवल 'डिफेंसिव' है; युद्ध में उतरने से खींचे हाथ

पश्चिम एशिया में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते 'मक्का डिफेंस पैक्ट' (Mecca Joint Defence Agreement) की पहली ही अग्निपरीक्षा में पोल खुलती नजर आ रही है। यमन के ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों, हवाई अड्डों और हाल ही में पवित्र शहर मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र के पास ड्रोन और मिसाइल दागे जाने के बाद रियाद ने जब अपने सहयोगियों की ओर देखा, तो पाकिस्तान की तरफ से सख्त सैन्य कार्रवाई के बजाय केवल बयानों की औपचारिकता देखने को मिली। खुद को इस्लामी मुल्कों का परमाणु शक्ति संपन्न अगुआ और पवित्र हरमैन शरीफैन का रक्षक बताने वाला पाकिस्तान अब सीधे युद्ध में कूदने से कतरा रहा है। पाकिस्तानी सेना ने आनन-फानन में इस समझौते की नई परिभाषा गढ़ते हुए इसे विशुद्ध रूप से 'डिफेंसिव' (रक्षात्मक) करार दिया है और सऊदी की मदद के लिए तत्काल कोई जवाबी सैन्य अभियान शुरू करने से साफ इनकार कर दिया है।

क्या है 'मक्का डिफेंस पैक्ट' और क्यों हुई थी इसकी तुलना 'नाटो' से?

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 7 अगस्त को मक्का में इस संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते की मूल धारा बिल्कुल 'नाटो' (NATO) के आर्टिकल-5 की तर्ज पर तैयार की गई थी, जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि तीनों देशों (सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की) में से किसी भी एक देश पर होने वाला सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

इस समझौते के बाद पाकिस्तान में भारी जश्न मनाया गया था, इमारतों पर लाइटें जलाई गईं और यह नैरेटिव गढ़ा गया कि पाकिस्तान अब मुस्लिम दुनिया की सुरक्षा का सिरमौर बन चुका है। समझौते के तहत यह भी तय था कि पाकिस्तान इसके पहले सचिवालय की कमान संभालेगा। लेकिन महज कुछ ही हफ्तों के भीतर जब सऊदी अरब की संप्रभुता और उसके शहरों पर हूतियों के लगातार हमले शुरू हुए, तो इस कथित 'इस्लामिक नाटो' की जमीनी हकीकत सामने आ गई।

पाकिस्तानी सेना की नई थ्योरी: 'यह पूरी तरह डिफेंसिव है, कोई आक्रामकता नहीं'

अल-अरबिया को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में पाकिस्तानी सेना की मीडिया विंग (ISPR) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी से जब यह तीखा सवाल पूछा गया कि समझौते के तहत पाकिस्तान सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपनी सेना या वायुसेना कब भेज रहा है, तो उन्होंने गोल-मोल जवाब देना शुरू कर दिया।

पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने सफाई देते हुए कहा, "पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुआ मक्का पैक्ट किसी क्षेत्रीय वर्चस्व या आक्रामक मकसद के लिए नहीं है। यह पूरी तरह से 'डिफेंसिव' (रक्षात्मक) है, जिसका उद्देश्य सिर्फ सामूहिक प्रतिरोध (Deterrence) सुनिश्चित करना है। इसमें न तो किसी पर हमला करने का इरादा है और न ही कोई आक्रामक पहलू है।" जब उनसे पूछा गया कि अगर सऊदी पर हमले जारी रहे तो पाकिस्तान वास्तव में क्या कदम उठाएगा, तो उन्होंने सैन्य विवरण को गोपनीय बताते हुए टाल दिया और कहा कि यह तीनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व पर निर्भर करेगा। वहीं पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया कि वे फिलहाल हूतियों के खिलाफ किसी भी सैन्य प्रतिक्रिया पर विचार नहीं कर रहे हैं।

सऊदी अरब को बचाने में पाकिस्तान के पैर क्यों कांप रहे हैं?

सऊदी अरब से 3 अरब डॉलर की नकद मदद और तेल सहायता लेने के बावजूद पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ मोर्चा खोलने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पा रहा है, इसके पीछे तीन बड़े भू-राजनीतिक और आंतरिक कारण हैं:

  • ईरान से सीधे टकराव का खौफ: पाकिस्तान ईरान के साथ करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है। यमन के हूती विद्रोही पूरी तरह ईरान द्वारा समर्थित हैं। अगर पाकिस्तानी सेना या वायुसेना हूतियों पर हमला करती है, तो इसका सीधा मतलब तेहरान से दुश्मनी मोल लेना होगा, जिसे पाकिस्तान की जर्जर अर्थव्यवस्था और सुरक्षा ढांचा बर्दाश्त नहीं कर सकता।

  • देश के भीतर शिया-सुन्नी तनाव का डर: पाकिस्तान की आबादी में करीब 20 प्रतिशत शिया समुदाय है, जिनका प्रभाव सेना के कई अधिकारियों तक है। यदि पाकिस्तान यमन के शिया हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब के लिए युद्ध में उतरता है, तो पाकिस्तान के अपने शहरों में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़कने का खतरा है।

  • 2015 का कड़वा इतिहास: यह पहला मौका नहीं है जब पाकिस्तान ने सऊदी अरब को ऐन वक्त पर धोखा दिया हो। साल 2015 में भी जब सऊदी अरब ने यमन ऑपरेशन के लिए पाकिस्तानी सेना मांगी थी, तब पाकिस्तान की संसद ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर सेना भेजने से इनकार कर दिया था।

रियाद में मायूसी, 'मक्का पैक्ट' केवल कागजी शेर साबित

सऊदी अरब के रक्षा विशेषज्ञों और सामरिक हलकों में इस बात को लेकर भारी निराशा है कि जिस पाकिस्तान को आर्थिक दिवालियापन से बचाने के लिए सऊदी अरब ने अपनी तिजोरी खोल दी, वही मुल्क संकट की घड़ी में 'डिफेंसिव' होने की आड़ लेकर पीछे हट रहा है।

हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी के जाजान रिफाइनरी और मक्का सीमा के करीब तक हमले करने के बाद भी पाकिस्तान का यह कहना कि 'यह विवाद बातचीत से सुलझना चाहिए', यह साबित करता है कि मक्का डिफेंस पैक्ट जमीन पर किसी काम का नहीं है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान केवल अरब देशों के पैसे और कूटनीतिक रसूख का फायदा उठाने के लिए समझौते करता है, लेकिन जब वास्तव में सीने पर गोली खाने की नौबत आती है, तो इस्लामाबाद कूटनीतिक बहानेबाजी बनाकर किनारा कर लेता है।