'ट्रंप पर मिसाइल, स्नाइपर और चाकू से हमले की साजिश!', इजरायल की बार-बार चेतावनियों के बावजूद अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA को क्यों नहीं हो रहा भरोसा? तुर्किए में प्लेन बदलने से लेकर नीति प्रभावित करने के खेल का बड़ा पर्दाफाश

'ट्रंप पर मिसाइल, स्नाइपर और चाकू से हमले की साजिश!', इजरायल की बार-बार चेतावनियों के बावजूद अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA को क्यों नहीं हो रहा भरोसा? तुर्किए में प्लेन बदलने से लेकर नीति प्रभावित करने के खेल का बड़ा पर्दाफाश

वैश्विक महाशक्ति अमेरिका और उसके सबसे करीबी मध्य पूर्व सहयोगी इजरायल के खुफिया तंत्र के बीच एक अभूतपूर्व और सनसनीखेज अविश्वास की खबर सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जान पर मंडराते खतरों को लेकर इजरायली खुफिया एजेंसियों (मोसाद व सैन्य खुफिया) ने पिछले एक साल के दौरान व्हाइट हाउस और अमेरिकी सुरक्षा तंत्र को बार-बार बेहद गंभीर और डरावने अलर्ट भेजे हैं। इजरायल का दावा रहा है कि ईरान ट्रंप की हत्या के लिए स्नाइपर शूटर, रैलियों में चाकू से हमले और यहां तक कि राष्ट्रपति के विशेष विमान 'एयर फोर्स वन' पर कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल (MANPADS) से हमले की तैयारी कर रहा है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हुए बड़े खुलासों के अनुसार, अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) और अन्य शीर्ष विश्लेषकों ने इजरायल द्वारा साझा की गई इन अत्यधिक विशिष्ट चेतावनियों पर खुला संदेह जताया है और उन्हें 'लो कॉन्फिडेंस' (कम भरोसेमंद) की श्रेणी में रखा है। इस खुलासे ने सवाल खड़ा कर दिया है कि जब दांव पर अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा लगी हो, तब वॉशिंगटन अपने सबसे खास साझीदार की खुफिया रिपोर्टों पर आंख मूंदकर भरोसा क्यों नहीं कर रहा है?

तुर्किए नाटो समिट में 'डिकॉय प्लेन' का ड्रामा: क्या थी इजरायल की सबसे बड़ी चेतावनी?

अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय खुफिया हलकों में अविश्वास की यह दरार तब खुलकर सामने आई जब जुलाई के महीने में तुर्किए की राजधानी अंकारा में आयोजित नाटो (NATO) शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी सीक्रेट सर्विस को एक असामान्य और गोपनीय 'डिसेप्शन ऑपरेशन' (छल अभियान) चलाना पड़ा।

उस दौरे से ठीक पहले इजरायली अधिकारियों ने सीधे व्हाइट हाउस के 'सिचुएशन रूम' को एक अति-विशिष्ट खुफिया इनपुट भेजा था। इजरायल का दावा था कि ईरानी ऑपरेटिव्स नाटो समिट के आसपास मौजूद हैं और जब राष्ट्रपति ट्रंप एयर फोर्स वन से उड़ान भरेंगे, तो उन पर शोल्डर-लॉन्च मिसाइल दागी जा सकती है।

इस चेतावनी के बाद कैमरे के सामने तो ट्रंप अपने पुराने एयर फोर्स वन विमान की सीढ़ियां चढ़कर अंदर गए, लेकिन सुरक्षाबलों ने चुपके से उन्हें दूसरे सैन्य विमान में शिफ्ट कर दिया और पुराने विमान को एक 'डिकॉय' (छलावा) के रूप में उड़ाया गया।

हालांकि, बाद में जब तुर्किए की खुफिया एजेंसियों और अमेरिकी टीमों ने जमीन पर पड़ताल की, तो वहां कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल या किसी सक्रिय ईरानी स्नाइपर का कोई भी ठोस और स्वतंत्र सबूत नहीं मिला।

अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA को क्यों नहीं हुआ भरोसा? 'लो कॉन्फिडेंस' की असली वजह

अमेरिकी खुफिया समुदाय में इजरायल की इन रिपोर्टों को लेकर भारी संशय की कई बुनियादी तकनीकी और रणनीतिक वजहें सामने आई हैं:

  • स्वतंत्र पुष्टिकरण का अभाव: सीआईए विश्लेषकों ने पाया कि हत्या की साजिशों से जुड़ी यह विशिष्ट जानकारियां पूरी तरह 'इजरायल-जनित' (Israeli-derived) थीं। अमेरिका के अपने उपग्रहों, इंटरसेप्ट्स या स्थानीय मुखबिरों के जरिए इन विशिष्ट दावों का कोई स्वतंत्र मिलान (Independent Verification) नहीं हो सका।

  • तुर्किए और नाटो सुरक्षा एजेंसियों की असहमति: जिस अंकारा में हजारों सुरक्षाकर्मी और नाटो की वायु रक्षा प्रणालियां तैनात थीं, वहां तुर्किए की शीर्ष खुफिया एजेंसी (MIT) ने स्पष्ट किया कि उन्हें ऐसे किसी मिसाइल खतरे का कोई संकेत नहीं मिला था।

  • अतिशयोक्तिपूर्ण परिदृश्य: अमेरिकी विश्लेषकों का मानना था कि एयर फोर्स वन जैसे दुनिया के सबसे सुरक्षित, मिसाइल-रोधी जैमर्स और फ्लेयर्स से लैस विमान को सामान्य शोल्डर-फायर मिसाइल से गिराने का दावा तकनीकी रूप से बहुत काल्पनिक (Fantastical) लगता है।

'सूचना देने से ज्यादा वॉशिंगटन की नीति प्रभावित करने की चाल': अमेरिकी अफसरों का आरोप

इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू वह आरोप है जो कुछ मौजूदा और पूर्व अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने लगाया है। अमेरिकी विश्लेषकों का मानना है कि इजरायल द्वारा साझा की जाने वाली ये चेतावनियां केवल राष्ट्रपति की जान बचाने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि व्हाइट हाउस के फैसलों को अपने पक्ष में मोड़ने और अमेरिका को ईरान के खिलाफ आक्रामक सैन्य कार्रवाई के लिए मजबूर करने की रणनीति का हिस्सा थीं।

अमेरिकी रक्षा हलकों में यह धारणा रही है कि इजरायल ईरान को अपने अस्तित्व के लिए सबसे तात्कालिक और बड़ा खतरा मानता है। इजरायल चाहता है कि अमेरिका ईरान के परमाणु और मिसाइल ठिकानों को पूरी तरह नष्ट कर दे।

अमेरिकी अधिकारियों का तर्क है कि जब इजरायल यह नैरेटिव बनाता है कि "ईरान सीधे आपके राष्ट्रपति को जान से मारने की कोशिश कर रहा है", तो इससे अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके प्रशासन पर भावनात्मक और राजनीतिक दबाव बनता है कि वे तेहरान के खिलाफ किसी भी कूटनीतिक बातचीत को छोड़कर सीधा सैन्य हमला बोल दें। अमेरिकी विश्लेषकों ने इसे नीति-निर्माण को 'आकार देने' (Shape Decision-making) वाला खुफिया पैंतरा करार दिया।

कासिम सुलेमानी की हत्या का बदला: खतरा असली है लेकिन प्रकृति पर मतभेद

यह सच है कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से मानती रही हैं कि ईरान डोनाल्ड ट्रंप को अपना बड़ा दुश्मन मानता है। जनवरी 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान इराक में बगदाद एयरपोर्ट के बाहर अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के सबसे ताकतवर सैन्य कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी की मौत हो गई थी। ईरान की शीर्ष हुकूमत और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने खुलेआम ऐलान किया था कि वे सुलेमानी की शहादत का बदला ट्रंप, पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और हमले से जुड़े कमांडरों से जरूर लेंगे।

अमेरिका का खुफिया विभाग यह स्वीकार करता है कि ईरान कानूनी, साइबर या भाड़े के अपराधियों के जरिए पूर्व व मौजूदा अमेरिकी अधिकारियों को निशाना बनाने की कोशिश करता रहा है। लेकिन विवाद इस बात पर है कि क्या ईरान वास्तव में एयर फोर्स वन पर मिसाइल दागने या नाटो समिट जैसे कड़े पहरे वाले विदेशी ठिकानों पर हाई-रिस्क सैन्य ऑपरेशन करने की स्थिति में था? सीआईए का मानना था कि ईरान इतना बड़ा सीधा कदम उठाकर अमेरिका के साथ पूर्ण परमाणु या पारंपरिक युद्ध का जोखिम नहीं उठाएगा।

सीक्रेट सर्विस की मजबूरी: 'तीन बाल-बाल बचे हादसों के बाद कोई जोखिम नहीं ले सकते'

भले ही सीआईए और पेंटागन के विश्लेषक इजरायली खुफिया इनपुट पर सवाल खड़े कर रहे थे, लेकिन राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार संस्था 'यूएस सीक्रेट सर्विस' (US Secret Service) के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

सीक्रेट सर्विस के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, "राष्ट्रपति ट्रंप पर पहले ही कई जानलेवा हमले (पेनसिल्वेनिया और फ्लोरिडा की घटनाएं) हो चुके हैं। जब सीक्रेट सर्विस तीन बार बाल-बाल बची हो, तो वह किसी भी इनपुट को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकती, भले ही उस खुफिया जानकारी की विश्वसनीयता पर 100 प्रतिशत भरोसा न हो।"

यही वजह है कि सीक्रेट सर्विस ने 'अत्यधिक सावधानी' (Abundance of Caution) के सिद्धांत पर काम करते हुए इजरायल की चेतावनी मिलते ही तुरंत सुरक्षा प्रोटोकॉल बदल दिया और डिकॉय विमान का सहारा लिया। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि झूठी चेतावनी पर अतिरिक्त सुरक्षा कर लेना बेहतर है, बजाय इसके कि एक अनदेखी चेतावनी किसी बड़ी राष्ट्रीय आपदा का कारण बन जाए।

इजरायल का पलटवार: 'साझा न करें तो छुपाने का आरोप, साझा करें तो राजनीति'

अमेरिकी मीडिया में अपने खुफिया इनपुट पर संदेह जताए जाने की खबरों पर इजरायल ने भी कड़ा रुख अपनाया है। वाशिंगटन स्थित इजरायली दूतावास के प्रवक्ता ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इजरायल केवल अपनी सहयोगी प्रतिबद्धताओं का पालन कर रहा है।

इजरायली प्रवक्ता ने दो टूक जवाब देते हुए कहा: "जो लोग यह दावा करते हैं कि इजरायल खुफिया जानकारी साझा करके अमेरिकी नीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है, अगर हम कोई महत्वपूर्ण जानकारी अपने पास रोक लेते, तो यही लोग सबसे पहले इजरायल पर महत्वपूर्ण खतरे को छिपाने का आरोप लगाते।" इजरायल का कहना है कि आतंकवादी और दुश्मन कभी भी पारंपरिक तरीकों से हमला नहीं करते, इसलिए हर तरह के खतरे को गंभीरता से लेना ही समझदारी है।

खुफिया विश्वसनीयता और भविष्य की अमेरिकी रणनीति

इजरायल और अमेरिका के बीच सामने आया यह खुफिया मतभेद केवल एक राष्ट्रपति की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि पश्चिम एशिया में दोनों देशों के रणनीतिक उद्देश्यों में कितना बड़ा अंतर आ चुका है। जहां इजरायल हर हाल में ईरान के साथ निर्णायक आर-पार की जंग चाहता है, वहीं वाशिंगटन की प्राथमिकता अपने सैनिकों और राष्ट्रपति को सुरक्षित रखते हुए क्षेत्र में कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की है।

अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों दलों के सांसदों ने अब इस पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र समीक्षा की मांग की है ताकि यह तय किया जा सके कि विदेशी खुफिया जानकारियों के आधार पर राष्ट्रपति के सुरक्षा तंत्र और राष्ट्रीय युद्ध नीति को किस हद तक संचालित होने दिया जा सकता है। यह प्रकरण आधुनिक खुफिया कूटनीति के इतिहास में एक ऐसा सबक बन चुका है जहां सूचना और प्रभाव के बीच की महीन लकीर ने दो सबसे करीबी सहयोगियों के बीच गहरे संदेह को जन्म दे दिया है।