नेपाल में तिब्बत से आई विनाशकारी बाढ़ से भीषण तबाही: 8 लोगों की मौत, मानसरोवर यात्रा पर निकले 105 भारतीय समेत 384 लोग लापता

नेपाल में तिब्बत से आई विनाशकारी बाढ़ से भीषण तबाही: 8 लोगों की मौत, मानसरोवर यात्रा पर निकले 105 भारतीय समेत 384 लोग लापता

नेपाल-चीन सीमा से सटे हिमालयी क्षेत्र में बुधवार सुबह कुदरत का ऐसा रौद्र रूप देखने को मिला जिसने दोनों देशों की सीमावर्ती बस्तियों को मलबे और पानी के तेज बहाव में तब्दील कर दिया। तिब्बत के उच्च हिमालयी क्षेत्र से अचानक उफनती हुई आई भोटेकोशी नदी ने नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में जलप्रलय ला दिया। इस भीषण प्राकृतिक आपदा में अब तक कम से कम 8 लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि पवित्र कैलाश मानसरोवर यात्रा और सीमावर्ती व्यापार मार्ग पर निकले 105 भारतीय नागरिकों समेत कुल 384 विदेशी व स्थानीय यात्री लापता बताए जा रहे हैं। नेपाल पर्यटन बोर्ड और स्थानीय प्रशासन ने लापता लोगों की तलाश के लिए सेना और राहत एजेंसियों को तैनात किया है। यह आपदा केवल भारी बारिश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे तिब्बत के पठार पर हुए बड़े भूगर्भीय और हिमनद से जुड़े बदलावों को मुख्य कारण माना जा रहा है।

सुबह 9 बजे का वह खौफनाक मंजर: जब ताश के पत्तों की तरह बहे पुल और बस्तियां

नेपाल के रसुवा जिले के रसुवागढ़ी, टिमुरे और स्याफ्रू बेसी इलाकों में बुधवार की सुबह आम दिनों की तरह ही शुरू हुई थी। सीमावर्ती व्यापारिक केंद्र और कैलाश मानसरोवर के लिए प्रमुख ट्रांजिट पॉइंट होने के कारण यहां सैकड़ों यात्री, सीमा शुल्क कर्मचारी और स्थानीय व्यापारी मौजूद थे। सुबह करीब 9 बजकर 15 मिनट पर तिब्बत की ओर से भोटेकोशी नदी में जलस्तर अचानक कई मीटर ऊपर उठ गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पानी के साथ भारी मात्रा में गाद, बोल्डर और पेड़ बहकर आए, जिसने 60 किलोमीटर के दायरे में आने वाली लगभग हर संरचना को अपनी चपेट में ले लिया। त्रिशूली नदी पर बने आधा दर्जन से अधिक पुल, व्यापारिक गोदाम, सीमा शुल्क कार्यालय और कई वाहन देखते ही देखते तेज धारा में विलीन हो गए। नुवाकोट के विदुर नगरपालिका क्षेत्र से चार शव बरामद किए गए, जिससे मरने वालों की संख्या बढ़कर आठ पहुंच गई।

105 भारतीय नागरिकों समेत 384 तीर्थयात्री लापता: परिजनों में हड़कंप

नेपाल पर्यटन बोर्ड (NTB) द्वारा जारी प्रारंभिक सूची के अनुसार, आपदा के बाद से 384 लोग लापता हैं, जिनमें 291 विदेशी नागरिक और 93 नेपाली सहायक व गाइड शामिल हैं। विदेशी नागरिकों में सबसे बड़ी संख्या भारत के 105 श्रद्धालुओं की है, जो रसुवागढ़ी सीमा पार कर तिब्बत में कैलाश मानसरोवर की यात्रा शुरू करने वाले थे। इसके अलावा नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, मलेशिया और ब्रिटेन के ट्रेकर्स भी संपर्क से बाहर हैं। अचानक बाढ़ आने से पूरे सीमावर्ती इलाके में बिजली के ट्रांसमिशन टॉवर और ऑप्टिकल फाइबर केबल उखड़ गए, जिससे दूरसंचार नेटवर्क पूरी तरह ठप हो गया। काठमांडू स्थित टूर ऑपरेटरों और भारतीय दूतावास ने परिजनों को आश्वस्त किया है कि नेटवर्क बंद होने के कारण संपर्क नहीं हो पा रहा है और सेना द्वारा सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचे लोगों की पहचान की जा रही है।

इस जलप्रलय का तिब्बत से क्या है सीधा कनेक्शन?

इस प्रलयंकारी बाढ़ का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि नेपाल के रसुवा या आसपास के मैदानी इलाकों में स्थानीय स्तर पर कोई असामान्य मूसलाधार बारिश दर्ज नहीं की गई थी। नेपाल के जलविज्ञान और मौसम विज्ञान विभाग (DHM) ने सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण कर पुष्टि की है कि पानी का यह विशाल सैलाब पूरी तरह से तिब्बत (चीन) के अंदरूनी हिस्से से शुरू हुआ था।

वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, इस घटना के पीछे दो मुख्य संभावित कारण सामने आ रहे हैं:

  • ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF): तिब्बत के उच्च पर्वतीय पठार पर स्थित किसी हिमनद झील का तटबंध टूटना (ग्लेशियर फटना) इसका प्रमुख कारण हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण तिब्बत के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे प्राकृतिक झीलों पर दबाव बढ़ जाता है और वे अचानक टूट जाती हैं।

  • लैंडस्लाइड डैम बर्स्ट (भूस्खलन से बनी अस्थायी झील का टूटना): तिब्बत के ग्यिरोंग (केरुंग) काउंटी में भारी वर्षा के कारण हुए भूस्खलन ने भोटेकोशी नदी के ऊपरी प्रवाह को अस्थायी रूप से रोक दिया था। कुछ ही घंटों में भारी जलजमाव के कारण जब यह प्राकृतिक बांध टूटा, तो लाखों क्यूसेक पानी प्रचंड वेग के साथ नेपाल की ढलानों की ओर बह निकला।

चीनी सरकारी मीडिया शिन्हुआ ने भी पुष्टि की है कि सीमा के उस पार तिब्बत के व्यापारिक केंद्र ग्यिरोंग में भीषण भूस्खलन और कीचड़ के सैलाब से भारी जान-माल का नुकसान हुआ है।

भोटेकोशी से त्रिशूली और भारत की गंडक नदी तक का जलमार्ग

भौगोलिक दृष्टि से यह समझना महत्वपूर्ण है कि तिब्बत से निकलने वाली भोटेकोशी नदी नेपाल में प्रवेश कर त्रिशूली नदी में मिलती है। त्रिशूली नदी आगे चलकर नारायणी नदी बनती है, जो भारत के बिहार राज्य में प्रवेश करते ही ऐतिहासिक गंडक नदी का रूप ले लेती है। इस पूरे नदी तंत्र का उद्गम तिब्बत के ऊंचे हिमनदों से जुड़ा है। जब तिब्बत में कोई मौसमी या भूगर्भीय हलचल होती है, तो उसका सीधा और तात्कालिक प्रभाव नेपाल के रास्ते भारत के तटीय जिलों तक पहुंचता है। इसी खतरे को देखते हुए नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण प्राधिकरण ने निचले जिलों जैसे रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, चितवन और गोरखा में हाई अलर्ट घोषित कर दिया है।

सेना, 14 हेलिकॉप्टर और स्निफर डॉग्स के साथ महा-रेस्क्यू ऑपरेशन

नेपाल के प्रधानमंत्री ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आपातकालीन कैबिनेट बैठक बुलाई और सेना को पूरे अभियान की कमान सौंप दी। नेपाली सेना, सशस्त्र पुलिस बल (APF) और नेपाल पुलिस के हजारों जवान रसुवा के दुर्गम इलाकों में पहुंच चुके हैं। राहत कार्यों में 14 विशेष हेलीकॉप्टरों, मलबे में दबे लोगों को खोजने वाले ड्रोन्स और खोजी कुत्तों (स्निफर डॉग्स) की मदद ली जा रही है। बुधवार दोपहर तक 25 से अधिक गंभीर रूप से फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया था, जिनमें से कई को धुंचे और काठमांडू के अस्पतालों में एयरलिफ्ट किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और आपातकालीन मेडिकल टीमें भी दवाओं और आवश्यक उपकरणों के साथ प्रभावित क्षेत्रों में तैनात हैं।

भारत पर क्या पड़ेगा असर और विदेश मंत्रालय का रुख

काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर एक 24x7 इमरजेंसी कंट्रोल रूम स्थापित किया है। भारत सरकार लगातार नेपाल सरकार के संपर्क में है ताकि लापता 105 भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा सके। वहीं दूसरी ओर, बिहार के सीमावर्ती जिलों—पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण और गोपालगंज के प्रशासन को गंडक नदी के जलस्तर में संभावित वृद्धि को देखते हुए सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं। जल संसाधन विभाग वाल्मीकि नगर बैराज पर पानी के डिस्चार्ज पर चौबीसों घंटे नजर बनाए हुए है ताकि किसी भी आपात स्थिति से समय रहते निपटा जा सके।