चीन में डैम फटने से नेपाल में मची जलप्रलय? आरोपों पर ड्रैगन ने तोड़ी चुप्पी, 'फेक न्यूज' बताते हुए अर्ली अलर्ट और तिब्बत में हुए नुकसान पर दी ये बड़ी सफाई
नेपाल के रसुवा और सीमावर्ती जिलों में 26 अगस्त को आई प्रलयंकारी बाढ़ के बाद जहां एक तरफ मलबे से शवों को निकालने का दर्दनाक सिलसिला जारी है, वहीं दूसरी तरफ इस महाविनाश के कारणों को लेकर एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। नेपाल के स्थानीय हलकों, सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जाने लगा कि तिब्बत की सीमा के अंदर चीन का कोई हाइड्रो प्रोजेक्ट या डैम टूट गया, जिसके चलते भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में अचानक जलप्रलय आ गई। इसके साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि बीजिंग ने ऊपरी जलक्षेत्र में जलस्तर बढ़ने का समय पर कोई पूर्व अलर्ट (Early Warning) काठमांडू के साथ साझा नहीं किया। अब इन सभी आरोपों पर 'ड्रैगन' ने आधिकारिक बयान जारी कर अपनी चुप्पी तोड़ी है और पूरे मामले पर बिंदुवार सफाई दी है।
काठमांडू से उठे दो गंभीर आरोप: डैम का टूटना और अलर्ट छिपाना
नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र रसुवागढ़ी और निचले नुवाकोट इलाके में जब बिना किसी मूसलाधार बारिश के भोटेकोशी नदी 30 फीट ऊंची मलबे की लहरों में तब्दील हो गई, तो हर कोई हैरान रह गया। इस आपदा में 160 से अधिक लोगों की जान चली गई, सैकड़ों लापता हो गए और 13 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स तबाह हो गए। इसके बाद नेपाल के राजनीतिक गलियारों में चीन की तरफ उंगलियां उठने लगीं।
पहला आरोप यह लगा कि चीनी सीमा के अंदर भूगर्भीय गतिविधियों या तकनीकी विफलता के चलते किसी जलविद्युत बांध अथवा कृत्रिम जलाशय का ढांचा टूटा, जिसका पानी सीधे नेपाल की तरफ बह निकला। दूसरा आरोप यह था कि चीन के हाइड्रोलॉजिकल स्टेशनों ने नदी के उफान पर आने का संकेत मिलने के बावजूद नेपाल के जल एवं मौसम विज्ञान विभाग को कोई त्वरित चेतावनी जारी नहीं की, जिससे सीमावर्ती इलाकों में लोगों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को सुरक्षित निकालने का समय नहीं मिल सका।
चीनी दूतावास का कड़ा रुख: 'डैम टूटने का दावा पूरी तरह भ्रामक और फेक न्यूज'
इन आरोपों पर कड़ा रुख अपनाते हुए काठमांडू स्थित चीनी दूतावास ने एक विस्तृत आधिकारिक बयान जारी किया। चीन ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें 'पूरी तरह झूठा, भ्रामक और फेक न्यूज' करार दिया है। चीनी प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि तिब्बत क्षेत्र में चीन का कोई भी बांध नहीं टूटा है और न ही चीनी हिस्से में किसी जलविद्युत परियोजना के कारण यह बाढ़ आई है।
चीनी दूतावास ने जोर देकर कहा कि इस मानवीय त्रासदी के समय एक-दूसरे पर बेबुनियाद आरोप लगाने के बजाय दोनों देशों को साझा बचाव और राहत कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। दूतावास ने कहा कि आरोप लगाने से संकट का हल नहीं निकलता, बल्कि आपसी सहयोग और सटीक वैज्ञानिक तालमेल से ही इंसानी जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।
चीन की दलील: 'हमारे यहां भी भारी तबाही, यह एक अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदा थी'
चीन ने अपने पक्ष में दलील देते हुए बताया कि यह त्रासदी केवल नेपाल तक सीमित नहीं थी, बल्कि सीमा के उस पार तिब्बत के क्यिरॉन्ग (Gyirong) काउंटी और बॉर्डर पोर्ट इलाके में भी इसने भीषण तबाही मचाई है। चीनी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सीमा पार उनके हिस्से में भी बुनियादी ढांचा पूरी तरह नष्ट हुआ है, 3 लोगों की मौत हुई है और 265 से अधिक लोग लापता हैं, जिनमें विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। क्यिरॉन्ग ड्राई पोर्ट पर संचार, बिजली नेटवर्क, सड़कें और पुल बाढ़ की चपेट में आकर बह गए।
चीन के मुताबिक, 26 अगस्त की सुबह 8:37 बजे सीमा क्षेत्र में दर्ज किए गए 4.4 से 5.2 तीव्रता के भूकंपीय झटके या बड़े कंपन के कारण खड़ी पहाड़ी ढलानों से बर्फ और चट्टानों का एक बहुत विशाल हिमस्खलन (Avalanche) हुआ। इस हिमस्खलन और भूस्खलन के कारण नेपाल-तिब्बत सीमा पर बहने वाली ल्हेंदे खोला (Lhende River) का रास्ता लाखों टन मलबे से अवरुद्ध हो गया। इस मलबे के टूटने से जो 'हाइपर-कंसंट्रेटेड डिब्रिस फ्लो' पैदा हुआ, उसने दोनों देशों के सीमावर्ती क्षेत्रों को एक साथ अपनी चपेट में ले लिया।
अर्ली वार्निंग पर चीन का स्पष्टीकरण: 'मिनटों में आई तबाही में डेटा ट्रांसमिशन का समय नहीं मिला'
बाढ़ की पूर्व चेतावनी न देने के आरोपों पर चीनी पक्ष ने स्पष्ट किया कि यह कोई पारंपरिक मानसूनी बारिश से धीरे-धीरे बढ़ने वाली बाढ़ नहीं थी। ग्लेशियल रॉकस्लाइड और प्राकृतिक अवरोध का टूटना मात्र 15 से 20 मिनट के भीतर हुआ। जब किसी संकरी घाटी में अचानक लाखों टन बर्फ और चट्टानें गिरकर पानी को रोकती हैं और कुछ ही मिनटों में वह अवरोध ढह जाता है, तो किसी भी पारंपरिक हाइड्रोलॉजिकल स्टेशन के लिए पहले से कोई स्वचालित चेतावनी जारी कर पाना तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।
हालांकि, चीन ने यह भी बताया कि घटना के तुरंत बाद चीनी जल संसाधन एजेंसियों ने सक्रियता दिखाते हुए आगे के खतरों पर नेपाल को सचेत करना शुरू कर दिया है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने हाल ही में नेपाल को आधिकारिक जानकारी दी है कि चोटचेन और पुरुपे त्सांगपो नदियों के संगम पर भारी मलबा जमा होने से लगभग 20 से 30 लाख घनमीटर पानी की एक नई झील बन रही है, जिस पर चीनी वैज्ञानिक सैटेलाइट और फ्लड सिमुलेशन के जरिए लगातार नजर रख रहे हैं ताकि नेपाल को समय रहते सेकेंडरी अलर्ट दिया जा सके।
नेपाली वैज्ञानिकों और भूविज्ञानियों की जांच क्या कहती है?
नेपाल के जल विज्ञान और मौसम विज्ञान विभाग (DHM) तथा स्वतंत्र भू-उपग्रह विश्लेषकों की शुरुआती जांच भी काफी हद तक चीनी दावे से मेल खाती नजर आ रही है। सैटेलाइट इमेजरी के विश्लेषण से पता चला है कि रसुवागढ़ी बॉर्डर से लगभग 20 किलोमीटर ऊपर ल्हेंदे नदी के कैचमेंट में एक विशाल हिमस्खलन और ग्लेशियल रॉकस्लाइड हुआ था। इस मलबे ने एक अस्थायी 'लैंडस्लाइड डैम' बनाया, जिसके अचानक फटने से भोटेकोशी नदी में सेकंडों के भीतर भयानक जलप्रवाह आ गया।
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने भी संसद को दिए अपने शुरुआती बयानों में स्वीकार किया है कि यह त्रासदी किसी मानव-निर्मित बांध के टूटने से नहीं, बल्कि अत्यधिक ऊंचाई पर हुए भूगर्भीय विस्फोट और प्राकृतिक मलबे के अवरोध हटने के कारण हुई है।
सीमा पार हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए मजबूत तंत्र की जरूरत
नेपाल और तिब्बत के बीच उभरे इस आरोप-प्रत्यारोप ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और भूगर्भीय अस्थिरता कितनी तेजी से बढ़ रही है। भारत, नेपाल और चीन जैसे देशों के लिए ट्रांस-बाउंड्री नदियों का रियल-टाइम डेटा साझा करना अब सिर्फ एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि लाखों नागरिकों के जीवन की रक्षा का अनिवार्य माध्यम बन चुका है।
जब तक दोनों देश सीमावर्ती नदियों पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्मिक सेंसर, रडार आधारित ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन और सैटेलाइट अर्ली वार्निंग सिस्टम का एक संयुक्त नेटवर्क स्थापित नहीं करेंगे, तब तक ऐसी अप्रत्याशित आपदाएं भारी जान-माल का नुकसान करती रहेंगी और संकट के समय कूटनीतिक अविश्वास को जन्म देती रहेंगी।