चले थे इस्लामिक नाटो बनाने, 1 महीने में ही आ गई दरार: सऊदी अरब ने पाकिस्तान को दिया तगड़ा झटका, औंधे मुंह गिरे असीम मुनीर
मुस्लिम उम्माह का अलंबरदार और इस्लामिक दुनिया का अघोषित सैन्य नेता बनने का पाकिस्तान का दशकों पुराना मुगालता एक बार फिर रेत की दीवार की तरह ढह गया है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) जनरल असीम मुनीर जिस तथाकथित 'इस्लामिक नाटो' (Islamic Military Counter Terrorism Coalition - IMCTC) को पुनर्जीवित कर अपनी साख चमकाने और खाड़ी देशों से भारी-भरकम वित्तीय व रक्षा इमदाद ऐंठने के ख्वाब देख रहे थे, उसे महज एक महीने के भीतर ही सबसे बड़ा झटका लग गया है। इस पूरे महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की रीढ़ माने जाने वाले सऊदी अरब ने पाकिस्तान के रणनीतिक मंसूबों से पल्ला झाड़ते हुए ऐसा करारा कूटनीतिक तमाचा जड़ा है कि रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) में सन्नाटा पसर गया है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के बदले रुख ने जनरल असीम मुनीर की वैश्विक सैन्य साख को औंधे मुंह गिरा दिया है।
रियाद में बुने थे बड़े ख्वाब: मुस्लिम देशों की संयुक्त सेना का नेतृत्व चाहता था रावलपिंडी
दरअसल, आर्थिक तंगहाली, राजनीतिक अस्थिरता और बलूचिस्तान व खैबर पख्तूनख्वा में लगातार हो रहे भीषण आतंकी हमलों से घिरी पाकिस्तानी सेना अपनी प्रासंगिकता साबित करने के लिए बेचैन थी। जनरल असीम मुनीर ने सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद खाड़ी देशों के ताबड़तोड़ दौरे किए। रियाद में सऊदी नेतृत्व के सामने यह नैरेटिव पेश किया गया कि लाल सागर में हूती विद्रोहियों का उपद्रव, गाजा संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव से निपटने के लिए सुन्नी मुस्लिम देशों को अपनी एक संयुक्त सैन्य कमान यानी 'इस्लामिक नाटो' की तर्ज पर पूरी तरह सक्रिय करना चाहिए।
पाकिस्तान ने उम्मीद लगाई थी कि पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ की तरह ही पाकिस्तानी फौज इस बहुराष्ट्रीय गठबंधन का नेतृत्व करेगी। इसके एवज में पाकिस्तान को सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से अरबों डॉलर का नया वित्तीय बेलआउट पैकेज, आधुनिक सैन्य उपकरण और सस्ता कच्चा तेल हासिल होगा। लेकिन रावलपिंडी यह भूल गया कि 2026 की भू-राजनीतिक हकीकतें 90 के दशक जैसी नहीं हैं।
सऊदी अरब का सीधा इनकार: पाकिस्तान के भाड़े के सैन्य मॉडल से तोड़ा नाता
सऊदी अरब के शाही रक्षा महकमे और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की ओर से आए ताजा संकेतों ने पाकिस्तान के सारे समीकरण बिगाड़ दिए हैं। राजनयिक सूत्रों के मुताबिक, सऊदी अरब ने पाकिस्तान द्वारा प्रस्तावित किसी भी नए संयुक्त सैन्य समझौते या पाकिस्तानी सैनिकों की बड़े पैमाने पर खाड़ी में तैनाती के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
सऊदी अरब ने साफ कर दिया है कि वह अपने रक्षा और रणनीतिक हितों को किसी भी ऐसी बहुपक्षीय व्यवस्था के हवाले नहीं करेगा जिसकी कमान पाकिस्तान जैसी आर्थिक रूप से कंगाल और आंतरिक रूप से बिखरी हुई सेना के हाथ में हो। सऊदी हुकूमत अपनी महत्वाकांक्षी आर्थिक परियोजना 'विजन 2030' के तहत क्षेत्रीय स्थिरता, विदेशी निवेश और व्यापारिक शांति चाहती है। रियाद किसी भी ऐसे गठबंधन में नहीं बंधना चाहता जो ईरान के साथ उसके हालिया कूटनीतिक समझौतों (चीन की मध्यस्थता से हुए समझौते) को खतरे में डाले या खाड़ी क्षेत्र को नए युद्ध के दलदल में धकेल दे।
अंदरूनी विरोधाभास: 1 महीने में ही क्यों बिखर गया 'इस्लामिक नाटो' का ताना-बाना?
कागजों पर 40 से अधिक देशों का साझा सैन्य मंच दिखने वाला यह गठबंधन जमीनी स्तर पर पहले दिन से ही गंभीर वैचारिक और रणनीतिक अंतर्विरोधों से जूझ रहा था:
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ईरान फैक्टर: किसी भी वास्तविक 'इस्लामिक गठबंधन' की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही है कि इसमें शिया बहुल ईरान, इराक और सीरिया जैसे देश शामिल नहीं हैं। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात अब ईरान के साथ सीधे टकराव से बचते हुए कूटनीतिक संतुलन साध रहे हैं, जबकि पाकिस्तान इसे ईरान विरोधी मोर्चे के रूप में भुनाकर खुद को जरूरी साबित करना चाहता था।
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सऊदी की अमेरिका और पश्चिम पर निर्भरता: सऊदी अरब को जब भी गंभीर सैन्य संकट (जैसे हूतियों के मिसाइल हमले या लाल सागर में तेल जहाजों पर खतरे) का सामना करना पड़ा, तो उसने पाकिस्तान के सैनिकों के बजाय सीधे वाशिंगटन और अमेरिकी पेंटागन से मदद मांगी। सऊदी भली-भांति जानता है कि अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम (पैट्रियट और थाड) अमेरिका के पास हैं, पाकिस्तान के पास नहीं।
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गठबंधन के भीतर अविश्वास: तुर्किये, कतर और मिस्र जैसे अन्य प्रमुख मुस्लिम देश पाकिस्तान के प्रभाव वाले किसी भी सैन्य ढांचे को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। तुर्किये अपनी स्वतंत्र सैन्य नीति चलाता है, जबकि मिस्र अपनी विशाल सेना को किसी तीसरे देश के इशारे पर नहीं झोंकना चाहता।
घर में लगी है आग, सीमा पर मुंह की खा रही पाकिस्तानी सेना
सऊदी अरब के इस कड़े झटके ने जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व पर खुद पाकिस्तान के भीतर सवाल खड़े कर दिए हैं। रक्षा विश्लेषक तंज कस रहे हैं कि जो सेना अपने ही मुल्क की सीमाओं और चौकियों की रक्षा करने में नाकाम साबित हो रही है, वह पूरे इस्लामिक जगत की सुरक्षा का ठेका लेने चली थी।
मौजूदा समय में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की नाक में दम कर रखा है। आए दिन पाकिस्तानी सेना के काफिलों और चेकपोस्टों पर आत्मघाती हमले हो रहे हैं और दर्जनों सैनिक मारे जा रहे हैं। अपनी आंतरिक सुरक्षा संभालने में पूरी तरह असहाय साबित हो रही सेना जब वैश्विक स्तर पर नाटो जैसी सेना बनाने का दावा करती है, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी जगंसाई होना स्वाभाविक है।
आर्थिक राहत का सपना भी टूटा, अब आईएमएफ के आगे हाथ फैलाने की मजबूरी
इस रणनीतिक झटके का सीधा असर पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। जनरल मुनीर को उम्मीद थी कि 'इस्लामिक नाटो' के नाम पर सऊदी अरब स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान (SBP) में जमा अपने पुराने 3 से 5 अरब डॉलर के डिपॉजिट्स को रोलओवर करने के साथ-साथ नया भारी निवेश भी करेगा।
लेकिन सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया है कि अब बिना ठोस आर्थिक सुधारों, निजीकरण और पारदर्शी परियोजनाओं के किसी भी देश को 'मुफ्त खैरात' नहीं दी जाएगी। सऊदी की बेरुखी के बाद पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की कड़ी शर्तों और नए कर्जों के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो गया है। कूटनीतिक रूप से अलग-थलग और आर्थिक रूप से कंगाल पाकिस्तान के लिए यह घटनाक्रम यह साबित करता है कि धार्मिक नारों की आड़ में अब वैश्विक स्तर पर सैन्य ब्लैकमेलिंग का खेल नहीं खेला जा सकता।