आज अप्लाई किया तो 179 साल बाद मिलेगा अमेरिकी ग्रीन कार्ड

आज अप्लाई किया तो 179 साल बाद मिलेगा अमेरिकी ग्रीन कार्ड

अमेरिका जाकर बसने, वहां की नामी टेक कंपनियों में काम करने और स्थायी रूप से 'ग्रीन कार्ड' यानी परमानेंट रेजिडेंसी हासिल करने का सपना देखने वाले लाखों भारतीयों के लिए एक बेहद चौंकाने वाली और निराशाजनक जमीनी हकीकत सामने आई है। यदि कोई भारतीय आईटी प्रोफेशनल, इंजीनियर, शोधकर्ता या उच्च शिक्षित पेशेवर आज के दिन रोजगार-आधारित (Employment-Based) ग्रीन कार्ड के लिए अपनी फाइल दाखिल करता है, तो उसका नंबर आने में कुछ महीने या साल नहीं, बल्कि 100 से लेकर 179 साल तक का समय लग सकता है।

हाल ही में वाशिंगटन स्थित प्रतिष्ठित थिंक टैंक 'नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी' (NFAP) और 'काटो इंस्टीट्यूट' द्वारा जारी किए गए नवीनतम अध्ययनों ने अमेरिकी इमिग्रेशन प्रणाली के उस स्याह पहलू को उजागर किया है, जो वर्षों से प्रतिभा पलायन और स्किल्ड प्रोफेशनल्स की बेबसी का कारण बना हुआ है। इस रिपोर्ट के अनुसार, ईबी-2 (EB-2) और ईबी-3 (EB-3) कैटेगरी में आवेदन करने वाले भारतीयों के लिए यह प्रतीक्षा अवधि अब सामान्य मानवीय जीवनकाल से भी कहीं आगे निकल चुकी है।

7 फीसदी का कोटा नियम: भारतीय प्रतिभाओं के गले की फांस

आखिर दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश में स्थायी नागरिकता की यह कतार इतनी लंबी क्यों हो गई? इसका मुख्य कारण दशकों पुराना अमेरिकी इमिग्रेशन कानून है, जिसे 1990 के इमिग्रेशन एक्ट के तहत लागू किया गया था। इस नियम के तहत अमेरिका हर साल रोजगार आधारित कुल 1,40,000 ग्रीन कार्ड जारी करता है। इस कुल कोटे पर एक सख्त शर्त यह है कि दुनिया के किसी भी एक देश को कुल ग्रीन कार्ड का अधिकतम 7 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा नहीं दिया जा सकता।

इसका सीधा गणित यह है कि चाहे आइसलैंड जैसा छोटा देश हो या भारत और चीन जैसे अरबों की आबादी वाले देश, सभी के लिए अधिकतम सीमा लगभग 9,800 ग्रीन कार्ड प्रतिवर्ष ही तय है। चूंकि अमेरिका के सिलिकॉन वैली, हेल्थकेयर, बैंकिंग और शोध संस्थानों में काम करने वाले 70 से 80 प्रतिशत कुशल विदेशी कामगार अकेले भारत से आते हैं, इसलिए भारत के आवेदनों की संख्या हर साल लाखों में बढ़ रही है, जबकि मिलने वाले कार्डों की संख्या मुट्ठी भर ही रह जाती है।

10 लाख से ज्यादा भारतीय फंसे, बैकलॉग में 79% हिस्सा सिर्फ एक देश का

आंकड़ों की बात करें तो स्थिति भयावह रूप ले चुकी है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड की पहली तीन श्रेणियों (EB-1, EB-2, EB-3) में कुल 12.6 लाख से अधिक लोग कतार में हैं। इनमें से लगभग 10 लाख आवेदक अकेले भारतीय मूल के हैं, जो पूरे वैश्विक बैकलॉग का लगभग 79 प्रतिशत है।

इनमें सबसे गंभीर संकट EB-2 श्रेणी में है, जिसमें मास्टर्स डिग्री या विशेष योग्यता वाले प्रोफेशनल्स आते हैं। अकेले इस श्रेणी में 7.3 लाख से अधिक भारतीय अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। वहीं ग्रेजुएट स्तर के प्रोफेशनल्स वाली EB-3 श्रेणी में भी 2.1 लाख से अधिक भारतीय फंसे हुए हैं। विशेषज्ञों का आकलन है कि यदि नियमों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं किया गया, तो आज आवेदन करने वाले युवाओं को अपनी पूरी जिंदगी अमेरिका में बिना ग्रीन कार्ड के ही बितानी पड़ेगी।

4 लाख से अधिक आवेदकों की कतार में ही मौत होने का अंदेशा

काटो इंस्टीट्यूट की विस्तृत रिपोर्ट में एक बेहद दिल दहला देने वाला मानवीय पहलू सामने रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान गति और तय कोटे के आधार पर, कतार में लगे लगभग 4,24,000 से अधिक भारतीय प्रोफेशनल्स ग्रीन कार्ड मिलने से पहले ही बूढ़े होकर दम तोड़ देंगे।

इस अंतहीन इंतजार का सबसे बड़ा खामियाजा इन प्रोफेशनल्स के बच्चों को भुगतना पड़ता है। नियम के अनुसार, जब तक माता-पिता को ग्रीन कार्ड नहीं मिलता, बच्चे H-4 डिपेंडेंट वीजा पर रहते हैं। जैसे ही बच्चे की उम्र 21 साल होती है, वह कानूनी रूप से 'एज-आउट' (Age Out) हो जाता है और उसे तुरंत अपना वीजा स्टेटस बदलकर F-1 छात्र वीजा में तब्दील करना पड़ता है या फिर देश छोड़ना पड़ता है। जिन बच्चों का पूरा बचपन अमेरिका में बीता, वे 21 साल की उम्र में अचानक गैर-दस्तावेजी या निर्वासन के डर के साए में आ जाते हैं।

H-1B वीजा का अंतहीन चक्रव्यूह और करियर की बंदिशें

ग्रीन कार्ड न मिलने के कारण भारतीय प्रोफेशनल्स दशकों तक H-1B वीजा के चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं। हर तीन साल में वीजा रिन्यूअल की प्रक्रिया, अंतरराष्ट्रीय यात्राओं के दौरान वीज़ा स्टैम्पिंग का डर, और नौकरी छूटने पर 60 दिनों के भीतर नई नौकरी खोजने या देश छोड़ने की तलवार उनके सिर पर हमेशा लटकती रहती है।

इतना ही नहीं, ग्रीन कार्ड प्रक्रिया के दौरान कई बार कर्मचारी अपनी कंपनी या पदोन्नति (प्रमोशन) भी आसानी से नहीं बदल पाते, क्योंकि नई भूमिका में जाते ही उनकी लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) प्रक्रिया दोबारा शुरू होने का जोखिम रहता है। इस व्यवस्था ने अमेरिका में काम कर रहे दुनिया के सबसे बेहतरीन आईटी और साइंस टैलेंट को एक बंधुआ जैसी मानसिक स्थिति में ला खड़ा किया है।

क्या है इस संकट से निकलने का रास्ता?

अमेरिकी कांग्रेस में पिछले कई वर्षों से 'ईगल एक्ट' (EAGLE Act) और 'बिलीव एक्ट' (BELIEVE Act) जैसे कई द्विदलीय विधेयक पेश किए जाते रहे हैं, जिनका मकसद 7% के प्रति-देश कोटे को समाप्त करना और ग्रीन कार्ड की कुल संख्या को बढ़ाना है। हालांकि, अमेरिकी घरेलू राजनीति और इमिग्रेशन पर जारी ध्रुवीकरण के कारण ये विधेयक अब तक कानून की शक्ल नहीं ले पाए हैं।

इस जटिल परिस्थिति को देखते हुए कई भारतीय पेशेवर अब वैकल्पिक रास्ते तलाश रहे हैं। कुछ लोग EB-1 श्रेणी (असाधारण क्षमता वाले रिसर्चर या एग्जीक्यूटिव) की ओर रुख कर रहे हैं, जहां कतार अपेक्षाकृत छोटी है। वहीं सक्षम निवेशक 8 लाख डॉलर से अधिक का निवेश कर EB-5 इन्वेस्टर वीजा का रास्ता चुन रहे हैं। इसके अलावा, भारी संख्या में भारतीय टैलेंट अब कनाडा, जर्मनी, यूके और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का रुख कर रहा है, जहां प्वाइंट-बेस्ड इमिग्रेशन सिस्टम के तहत कुछ ही वर्षों में स्थायी निवास और नागरिकता का पारदर्शी रास्ता मिल जाता है।