'नेपाल की बाढ़ पूरी दुनिया के लिए चेतावनी थी, क्या आपने सुनी?': संयुक्त राष्ट्र में गरजे प्रधानमंत्री बालेन शाह

'नेपाल की बाढ़ पूरी दुनिया के लिए चेतावनी थी, क्या आपने सुनी?': संयुक्त राष्ट्र में गरजे प्रधानमंत्री बालेन शाह

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें उच्चस्तरीय सत्र के मंच से नेपाल के युवा प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (बालेन शाह) ने वैश्विक समुदाय को जलवायु संकट की भयावह हकीकत से रूबरू कराते हुए एक बेहद भावुक और कड़ा संदेश दिया है। अपने देश में हाल ही में आई विनाशकारी भोटेकोशी बाढ़ और भूस्खलन की त्रासदी का जिक्र करते हुए बालेन शाह ने वैश्विक नेताओं की अंतरात्मा को झकझोर दिया। उन्होंने दो टूक लहजे में पूछा कि क्या दुनिया ने हिमालय के पिघलने और नेपाल में मची तबाही की उस गूंज को सुना है? 36 वर्षीय प्रधानमंत्री ने न केवल वैश्विक तापमान वृद्धि को लेकर विकसित देशों को घेरा, बल्कि युद्ध के हथियारों की त्वरित सप्लाई और गरीब मुल्कों में खाद-अनाज की किल्लत की तुलना कर मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के दोहरे चरित्र की भी कलई खोल दी।

'तबाही का मंजर नेपाल की अकेली त्रासदी नहीं, यह पूरी दुनिया के लिए अलार्म'

संयुक्त राष्ट्र के मंच से संबोधित करते हुए बालेन शाह ने कहा कि वे केवल विकास और कूटनीति की औपचारिक बातें करने नहीं आए हैं, बल्कि उस दर्द और विनाश को बयां करने आए हैं जहां हजारों परिवार अपनों के शव तलाश रहे हैं और मिनटों में बस्तियां, पुल व स्कूल मलबे में तब्दील हो गए। उन्होंने कहा, "भोटेकोशी-त्रिशूली की आपदा केवल नेपाल का स्थानीय संकट नहीं थी, यह पूरी मानव जाति के लिए प्रकृति की एक खुली चेतावनी थी। और आज मैं इस मंच से पूछता हूं—क्या दुनिया ने सच में उस चेतावनी को सुना है?"

बालेन शाह ने रेखांकित किया कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी 0.1 प्रतिशत से भी कम है, लेकिन जलवायु परिवर्तन का सबसे भयावह दंश नेपाल और हिमालयी क्षेत्र की जनता को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि जब घर जल रहा हो, तो पचास फॉर्म भरने की औपचारिकता नहीं निभाई जाती, बल्कि सीधे आग बुझाने के कदम उठाए जाते हैं।

'हथियार 72 घंटे में पहुंच जाते हैं, लेकिन किसान को खाद नहीं मिलती'

अपने संबोधन के सबसे तीखे और प्रभावशाली हिस्से में बालेन शाह ने वैश्विक सप्लाई चेन और महाशक्तियों की प्राथमिकताओं पर खुला प्रहार किया। उन्होंने कहा, "हमने एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था खड़ी कर दी है जहां जंग के साजो-सामान की लॉजिस्टिक्स एकदम सटीक है, लेकिन भोजन और जीवन रक्षक चीजों की सप्लाई पूरी तरह ध्वस्त है।"

उन्होंने कहा कि जब सरहदों के आर-पार बंदूकें, मिसाइलें और गोला-बारूद बिना किसी अड़चन के समय पर पहुंच सकते हैं, तो एक गरीब देश का किसान सही समय पर खाद और ईंधन क्यों नहीं पा सकता? बालेन शाह ने भारत, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, पाकिस्तान और श्रीलंका का नाम लेते हुए कहा कि यह केवल नेपाल की दुर्भाग्यपूर्ण दास्तान नहीं है, बल्कि पूरा दक्षिण एशिया उस जलवायु संकट से जूझ रहा है जिसे उन्होंने गर्म नहीं किया, और उन युद्धों की मार झेल रहा है जिन्हें उन्होंने कभी शुरू ही नहीं किया।

भारत, चीन और नेपाल मिलकर बनाएं 'हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस सिस्टम'

आपदा के तुरंत बाद मदद के लिए आगे आने पर भारत और चीन का आभार व्यक्त करते हुए बालेन शाह ने एक दूरदर्शी कूटनीतिक प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने कहा कि हिंदू कुश हिमालय पर्वत श्रृंखला दो अरब से अधिक लोगों का जीवन-स्रोत्र है। ग्लेशियर और नदियां पासपोर्ट या वीजा देखकर सीमाएं तय नहीं करतीं।

बालेन शाह ने प्रस्ताव दिया कि भारत, चीन और नेपाल को मिलकर एक साझा 'हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म' (Himalayan Climate Resilience Mechanism) की स्थापना करनी चाहिए। इस तंत्र के जरिए तीनों देश सैटेलाइट डेटा का आदान-प्रदान करें, खतरनाक ग्लेशियल झीलों (GLOF) की लगातार निगरानी करें और अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम को मजबूत बनाएं ताकि समय रहते जान-माल के नुकसान को टाला जा सके।

सहायता के नाम पर कर्ज नहीं, अनुदान दे दुनिया

बालेन शाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब कोई जलवायु प्रेरित आपदा किसी विकासशील देश की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को तबाह कर देती है, तो उसका समाधान 'नया भारी-भरकम कर्ज' देना नहीं हो सकता। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के 'लॉस एंड डैमेज फंड' (Loss and Damage Fund) की जटिल नौकरशाही प्रक्रियाओं की आलोचना करते हुए कहा कि प्रभावित देशों को ग्रांट-बेस्ड (अनुदान आधारित) वित्तीय मदद मिलनी चाहिए।

बालेन शाह के इस बेबाक, यथार्थवादी और आक्रामक भाषण ने संयुक्त राष्ट्र के हॉल में मौजूद दुनिया भर के राजनयिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया। सोशल मीडिया पर भी उनके इस संबोधन की जमकर तारीफ हो रही है और इसे तीसरी दुनिया के मुल्कों की सबसे मुखर आवाज माना जा रहा है।