बांग्लादेश के रंगपुर में हिंदू परिवार के 4 लोगों के मर्डर मिस्ट्री में नया मोड़: डोप टेस्ट ने उड़ाई पुलिस थ्योरी की धज्जियां, क्या सबूत मिटाने के लिए बहाया गया था पानी?
बांग्लादेश के उत्तरी हिस्से में स्थित रंगपुर शहर की शांत गलियां उस वक्त दहल उठीं, जब एक ही घर के भीतर चार बेकसूर लोगों के खून से लथपथ शव बरामद हुए। 65 वर्षीय रिटायर्ड शिक्षक गणपति चक्रवर्ती, उनकी धर्मपत्नी प्रीतिलता, होनहार बेटी आगामी और महज 12 साल के मासूम बेटे प्रियम की जिस बर्बरता से जान ली गई, उसने पूरे इलाके को दहशत में डाल दिया। यह केवल चार कत्ल का मामला नहीं था, बल्कि एक हंसते-खेलते हिंदू परिवार को पूरी तरह मिटा देने की रूह कंपाने वाली वारदात थी।
घटना की सूचना मिलते ही जब स्थानीय लोग मौके पर पहुंचे, तो चारों तरफ चीख-पुकार और मातम का मंजर था। प्राथमिक स्तर पर पुलिस महकमे ने इसे डकैती और लूट के इरादे से अंजाम दिया गया कत्ल करार देकर मामले को दबाने की कोशिश की। मगर जैसे-जैसे दिन बीतते गए और जांच की परतें खुलनी शुरू हुईं, पुलिस का बनाया हर ढांचा लड़खड़ाता नजर आने लगा। घटना स्थल के हालात, कत्ल का तरीका और परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा शोर न मचा पाने की परिस्थितियां यह चीख-चीख कर कह रही थीं कि यह कोई साधारण लूटपाट नहीं, बल्कि एक बेहद सोची-समझी और खौफनाक साजिश का हिस्सा है।
ड्रग्स की थ्योरी और डोप टेस्ट का चौंकाने वाला खुलासा
स्थानीय स्तर पर उठते आक्रोश को शांत करने के लिए रंगपुर पुलिस ने आनन-फानन में दो स्थानीय युवकों, सिद्धार्थ दास और मुग्ध दास को मुख्य अभियुक्त बनाकर हिरासत में लिया। पुलिस ने मीडिया के सामने एक मनगढ़ंत थ्योरी पेश करते हुए दावा किया कि दोनों युवक देर रात गणपति चक्रवर्ती के मकान की छत पर बैठकर नशीली दवाओं का सेवन कर रहे थे। पुलिस के मुताबिक, इसी दौरान रिटायर्ड शिक्षक गणपति चक्रवर्ती ने उन्हें रंगे हाथों देख लिया। पकड़े जाने और बदनामी के खौफ से घबराकर दोनों युवकों ने मिलकर एक-एक करके गणपति, उनकी पत्नी, बेटी और 12 साल के मासूम बेटे को मौत के घाट उतार दिया।
पुलिस की इस सुविधाजनक कहानी पर उस समय पानी फिर गया जब 31 अगस्त को दोनों आरोपियों की आधिकारिक डोप टेस्ट रिपोर्ट सार्वजनिक हुई। मेडिकल रिपोर्ट में यह साफ हो गया कि दोनों युवकों के शरीर में किसी भी तरह के मादक पदार्थ या ड्रग्स का कोई नामोनिशान तक नहीं था। डोप टेस्ट का नतीजा पूरी तरह निगेटिव आने के बाद रंगपुर पुलिस की यह तथाकथित ‘ड्रग्स पैनिक’ थ्योरी ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। जब आरोपियों ने नशा किया ही नहीं था, तो फिर नशे की हालत में पकड़े जाने के डर से चार-चार कत्ल करने की पुलिसिया दलील पूरी तरह बेबुनियाद साबित हो गई।
6 घंटे घर में रुकना, नहाना और खाना: क्या कहती है पुलिस की अजीब दास्तान?
डोप टेस्ट की विफलता के अलावा पुलिस की चार्जशीट जैसी कहानी में कई ऐसे झोल हैं, जिन्हें सुनकर कानून और अपराध मामलों के जानकार भी हैरान हैं। पुलिस का कहना है कि चारों लोगों का कत्ल करने के बाद दोनों आरोपी डर के मारे भागे नहीं, बल्कि वे पूरे 6 से 7 घंटे तक उसी खून से सने घर के अंदर आराम से डटे रहे। पुलिस के अनुसार, इन दोनों लड़कों ने घर के अंदर खाना तलाशा, भोजन किया, इतमीनान से बाथरूम में नहाया, दोबारा नशे का सेवन किया और फिर अगली सुबह की अजान के वक्त बिल्कुल सामान्य तरीके से मुख्य दरवाजे से बाहर निकल गए।
यह दावा जमीनी हकीकत और इंसानी फितरत से कोसों दूर दिखाई देता है। सिद्धार्थ दास के पिता बिनॉय चंद्र दास ने इस पर बेहद गंभीर और जायज सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि दोनों लड़के शारीरिक रूप से बेहद दुबले-पतले और कमजोर हैं। क्या ऐसे दो लड़के बिना किसी हथियारबंद गिरोह के, बिना किसी जोर-जबर्दस्ती के चार वयस्कों और बच्चों को इस सफाई से मार सकते हैं कि घर में तिनका भी न हिले? क्या यह संभव है कि पड़ोसियों से घिरे इस रिहायशी इलाके में चार लोगों को एक के बाद एक कत्ल कर दिया जाए और किसी एक के मुंह से भी चीख या मदद की गुहार न निकले? स्थानीय बाशिंदों के लिए पुलिस का यह गैर-जिम्मेदाराना बयान गले उतारना कतई मुमकिन नहीं हो रहा है।
कमिश्नर के बदलते बयान और बिना सवालों के खत्म हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस
इस दोहरे हत्याकांड और लीपापोती के बीच सबसे संदिग्ध भूमिका रंगपुर के पुलिस कमिश्नर की कार्यप्रणाली को लेकर मानी जा रही है। जांच की शुरुआत से लेकर अब तक पुलिस कमिश्नर के आधिकारिक बयानों में कई बार विरोधाभास देखा गया। 23 अगस्त को मीडिया को ब्रीफ करते हुए कमिश्नर ने स्पष्ट कहा था कि मुख्य पीड़ित गणपति चक्रवर्ती की हत्या छत पर की गई, जबकि उनकी पत्नी और बेटी को दूसरी मंजिल की सीढ़ियों पर काटा गया और 12 वर्षीय बेटे प्रियम का शव बेडरूम में मिला था।
मगर महज चार दिन बाद, यानी 27 अगस्त को बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में कमिश्नर पूरी तरह पलट गए। नए बयान में उन्होंने दावा किया कि गणपति चक्रवर्ती, उनकी पत्नी प्रीतिलता और बेटी आगामी, तीनों की हत्या छत पर ही की गई थी और बाद में उनके शवों को घसीट कर नीचे सीढ़ियों तक लाया गया था। इस नए मोड़ पर जब स्थानीय पत्रकारों ने उनसे सवाल पूछने चाहे, तो पुलिस कमिश्नर पहले से तैयार लिखित बयान पढ़कर तेजी से कमरे से बाहर निकल गए। मीडिया के तीखे सवालों का सामना किए बिना प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़ना इस बात का पुख्ता संकेत बन गया कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
बहता पानी, कटी बिजली और सबूत मिटाने की गंभीर आशंकाएं
इस हत्याकांड में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला पहलू घटनास्थल से फॉरेंसिक सबूतों का योजनाबद्ध तरीके से नष्ट होना है। जिस रात यह घटना घटी और जब अगले दिन पुलिस ने घर को अपने कब्जे में लिया, उस दौरान घर की मुख्य बिजली सप्लाई कटी हुई पाई गई थी। सबसे ज्यादा संदेहास्पद बात यह थी कि घर का पानी का पंप लगातार चालू छोड़ दिया गया था, जिससे छत और सीढ़ियों पर लगातार पानी बहता रहा।
फॉरेंसिक विशेषज्ञों का मानना है कि हत्या के बाद खून के धब्बों, जूतों के निशानों, फिंगरप्रिंट्स और संघर्ष के जैविक साक्ष्यों को हटाने के लिए पानी का ऐसा अनवरत बहाव किसी पेशेवर अपराधी की चाल हो सकती है। बिजली कटे रहने और पानी बहते रहने से छत पर मौजूद कई महत्वपूर्ण फॉरेंसिक साक्ष्य धुल गए। इसके अलावा, लूट की रकम और घर से बरामद गहनों के आंकड़ों को लेकर भी पुलिस की ओर से जारी बयानों में भारी विसंगतियां दर्ज की गईं। शुरुआत में लाखों की डकैती का दावा करने वाली पुलिस बाद में बरामदगी के मामूली आंकड़े पेश करने लगी, जिससे यह सवाल और गहरा गया कि क्या असली गुनहगारों को बचाने के लिए घटनास्थल पर कृत्रिम दृश्य तैयार किया गया था?
स्थानीय नागरिकों और मानवाधिकार संगठनों के अनसुलझे सवाल
रंगपुर का यह सनसनीखेज मामला अब केवल स्थानीय पुलिस का केस नहीं रह गया है, बल्कि यह बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू परिवारों की सुरक्षा और निष्पक्ष कानून-व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह बन चुका है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पीड़ित परिवार के शुभचिंतकों का स्पष्ट मानना है कि जांच एजेंसी किसी बड़े सिंडिकेट, भू-माफिया या प्रभावशील ताकतों को बचाने के लिए दो निर्दोष और साधनहीन लड़कों को बलि का बकरा बना रही है।
चार निर्दोष इंसानों की एक ही रात में हुई यह खामोश हत्या कई ऐसे सवालों को पीछे छोड़ गई है जिनका जवाब रंगपुर पुलिस के पास फिलहाल नहीं है। जब तक किसी उच्चस्तरीय और स्वतंत्र एजेंसी से इस पूरे घटनाक्रम, सीडीआर (कॉल डिटेल रिकॉर्ड), फॉरेंसिक रिपोर्ट और पुलिस अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच नहीं कराई जाती, तब तक गणपति चक्रवर्ती और उनके मासूम परिवार को सच्चा न्याय मिलना नामुमकिन सा नजर आता है। पूरे क्षेत्र में फैली अशांति और अविश्वास की यह लहर तभी शांत होगी जब असली कातिलों के चेहरे बेनकाब किए जाएंगे।