अमेरिका में फूटा जनता का आक्रोश! गैलप के सर्वे में 89% नागरिकों ने माना सरकार में फैला है व्यापक भ्रष्टाचार

अमेरिका में फूटा जनता का आक्रोश! गैलप के सर्वे में 89% नागरिकों ने माना सरकार में फैला है व्यापक भ्रष्टाचार

दुनिया के सबसे पुराने और शक्तिशाली लोकतंत्र का दंभ भरने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका की आंतरिक व्यवस्था और जनता के भरोसे की दीवारों में भारी दरार आ चुकी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी के बाद से ही प्रशासनिक फैसलों, विदेशी नीतियों और व्यापारिक प्राथमिकताओं को लेकर अमेरिकी अवाम के भीतर गहराता असंतोष अब आधिकारिक आंकड़ों के रूप में सतह पर आ गया है। वैश्विक स्तर पर जनमत का सटीक आकलन करने वाली सबसे प्रतिष्ठित शोध संस्था 'गैलप' (Gallup) के ताजा सर्वेक्षण ने वाशिंगटन के सत्ता गलियारों में भूकंप ला दिया है। इस सर्वेक्षण के अनुसार, रिकॉर्ड 89 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों का मानना है कि उनकी संघीय सरकार में भ्रष्टाचार व्यापक रूप से फैला हुआ है। यह आंकड़ा पिछले 20 वर्षों में दर्ज किया गया अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है। जिस देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण के चलते किसी भी नीतिगत मुद्दे पर आम सहमति बनना असंभव माना जाता था, वहां 10 में से 9 नागरिकों का अपनी ही सरकार को भ्रष्ट घोषित कर देना यह साबित करता है कि जनता का विश्वास संस्थागत तंत्र से लगभग पूरी तरह उठ चुका है।

गैलप सर्वे का चौंकाने वाला खुलासा: 20 साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा सरकारी भ्रष्टाचार का आंकड़ा

गैलप द्वारा जारी विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, 89 प्रतिशत अमेरिकियों का यह विचार किसी एक दल या घटना की तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक खतरनाक और निरंतर चढ़ता हुआ ग्राफ है। वर्ष 2024 में पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल के अंतिम दौर में यह आंकड़ा 73 प्रतिशत दर्ज किया गया था। इसके बाद जब 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा राष्ट्रपति पद की शपथ ली, तो यह प्रतिशत उछलकर 79 प्रतिशत पर पहुंच गया था। अब 2026 के मध्यावधि दौर में मात्र एक वर्ष के भीतर 10 प्रतिशत अंकों की भारी छलांग लगाते हुए यह 89 प्रतिशत के ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच चुका है।

यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो 2010 से लेकर 2025 के 15 वर्षों के लंबे अंतराल में यह आंकड़ा हमेशा 72 प्रतिशत से 79 प्रतिशत के दायरे में घूमता रहा था। 89 प्रतिशत का यह नया स्तर न केवल सांख्यिकीय दृष्टि से असाधारण है, बल्कि यह प्रदर्शित करता है कि ट्रंप प्रशासन के पिछले डेढ़ वर्ष के फैसलों ने जनता के मन में यह धारणा पक्की कर दी है कि सत्ता का उपयोग जनहित के स्थान पर निजी और कॉर्पोरेट लाभ के लिए किया जा रहा है। हालांकि सर्वेक्षण के मुख्य प्रश्न में सीधे तौर पर राष्ट्रपति ट्रंप का नाम नहीं लिया गया था, लेकिन संस्थागत विश्लेषकों का मानना है कि शासन की बागडोर संभालने वाले शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली ही जनता की इस व्यापक धारणा की मुख्य सूत्रधार है।

डेमोक्रेट्स, रिपब्लिकन और निर्दलीय: क्या अमेरिकी राजनीति में मिट गई वैचारिक खाई?

अमेरिकी राजनीति में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टियों के समर्थकों के बीच की वैचारिक खाई जगजाहिर है, किंतु भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इस सर्वे ने दोनों पक्षों को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है। सबसे तीव्र उछाल डेमोक्रेट मतदाताओं की सोच में दर्ज किया गया है। वर्ष 2024 में जब जो बाइडेन सत्ता में थे, तब केवल 57 प्रतिशत डेमोक्रेट्स सरकार में व्यापक भ्रष्टाचार मानते थे। 2025 में ट्रंप के आते ही यह आंकड़ा 76 प्रतिशत हुआ और अब 2026 में यह अभूतपूर्व रूप से 91 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

निर्दलीय (Independent) मतदाताओं का रुख किसी भी चुनाव में सरकार का भविष्य तय करता है। निर्दलीय नागरिकों के बीच भ्रष्टाचार की धारणा 2024 के 78 प्रतिशत से बढ़कर सीधे 90 प्रतिशत पर आ टिकी है। वहीं दूसरी ओर, रिपब्लिकन पार्टी के मतदाताओं का आंकड़ा भी हैरान करने वाला है। रिपब्लिकन समर्थकों में से 83 प्रतिशत लोग मानते हैं कि सरकार में भ्रष्टाचार व्याप्त है। हालांकि रिपब्लिकन का यह प्रतिशत ऐतिहासिक रूप से स्थिर रहा है, लेकिन अपनी ही पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार होने के बावजूद 83 प्रतिशत समर्थकों का यह स्वीकार करना कि व्यवस्था भ्रष्ट है, यह दर्शाता है कि ट्रंप का आक्रामक एजेंडा उनके अपने कोर वोट बैंक के भीतर भी संस्थागत शुचिता का भरोसा नहीं जगा पा रहा है।

बिजनेस सेक्टर में भी 71% अविश्वास: हितों के टकराव और कॉर्पोरेट प्रभाव पर उठे सवाल

अमेरिकी नागरिकों का यह रोष केवल वॉशिंगटन के सरकारी दफ्तरों या कैपिटल हिल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के कॉरपोरेट और व्यापारिक जगत को लेकर भी जनता का संदेह चरम पर है। सर्वे में शामिल 71 प्रतिशत लोगों ने स्पष्ट कहा कि अमेरिकी व्यापार जगत (Business Sector) में भी भ्रष्टाचार गहराई से अपनी जड़ें जमा चुका है। वर्ष 2024 में यह आंकड़ा 59 प्रतिशत था, यानी पिछले दो सालों में कॉरपोरेट सेक्टर को लेकर अविश्वास में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

विशेषज्ञों का ध्यान इस बात पर विशेष रूप से गया है कि सरकारी भ्रष्टाचार (89%) और व्यापारिक भ्रष्टाचार (71%) के बीच का यह 18 प्रतिशत अंकों का अंतर गैलप के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा अंतर है। ऐतिहासिक रूप से यह अंतर केवल 11 अंकों के आसपास रहता था। जनता का यह मानना है कि राजनीति और बड़े कॉर्पोरेट घरानों के बीच का अपवित्र गठजोड़ ही इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यक्तिगत रियल एस्टेट, मीडिया और गोल्फ क्लब व्यवसायों के साथ सरकारी नीतियों का टकराव, व्हाइट हाउस में अरबपति दानदाताओं का सीधा दखल, पेंटागन के रक्षा अनुबंधों में चहेती कंपनियों को तरजीह और टैक्स छूटों का लाभ केवल शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों को मिलने की खबरों ने आम करदाताओं के भीतर भारी क्षोभ भर दिया है।

ओईसीडी (OECD) देशों में सबसे ऊपर अमेरिका: लेबनान और पेरू के समकक्ष पहुंची वैश्विक छवि

इस सर्वेक्षण का अंतरराष्ट्रीय आयाम अमेरिका की वैश्विक प्रतिष्ठा के लिए अत्यंत चिंताजनक है। गैलप दुनिया भर के 132 देशों में नागरिकों के बीच भ्रष्टाचार की धारणा का नियमित अध्ययन करता है। 89 प्रतिशत के इस नए आंकड़े के साथ अमेरिका विकसित देशों के संगठन यानी 'ओईसीडी' (OECD) की सूची में भ्रष्टाचार की धारणा के मामले में सबसे शीर्ष पायदान पर पहुंच गया है। इसका अर्थ यह है कि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे तमाम विकसित लोकतंत्रों की तुलना में अमेरिकी जनता अपनी सरकार को कहीं अधिक भ्रष्ट मानती है।

वैश्विक स्तर पर 2023 के बाद से केवल चार ही ऐसे देश रहे हैं जहां जनता में भ्रष्टाचार की धारणा अमेरिका से अधिक या उसके बराबर दर्ज की गई है—लेबनान (92%), पेरू (92%), घाना (90%) और नाइजीरिया (90%)। आर्थिक रूप से तबाह या भारी राजनीतिक अस्थिरता झेल रहे इन विकासशील देशों की कतार में संयुक्त राज्य अमेरिका का खड़ा होना वाशिंगटन की लोकतांत्रिक साख पर एक बहुत बड़ा काला धब्बा माना जा रहा है। जो देश दुनिया भर में मानवाधिकारों, पारदर्शी शासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की शुचिता का पाठ पढ़ाता रहा है, उसके अपने ही नागरिक अपनी सरकार को घाना और पेरू की श्रेणी में देख रहे हैं।

2026 के मध्यावधि (Midterm) चुनावों पर असर: क्या ट्रंप प्रशासन के खिलाफ बनेगा मुख्य चुनावी मुद्दा?

वर्ष 2026 के उत्तरार्ध में होने जा रहे अमेरिकी मध्यावधि (Midterm) चुनावों के ठीक मुहाने पर इस सर्वेक्षण के सार्वजनिक होने से रिपब्लिकन पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी संसद के दोनों सदनों—प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और सीनेट (Senate) में अपने बहुमत को बचाने के लिए जूझ रही रिपब्लिकन पार्टी के लिए यह सर्वे एक खतरे की घंटी है।

विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने पहले ही इस सर्वे के आंकड़ों को अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाने का ऐलान कर दिया है। डेमोक्रेट्स का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन ने व्हाइट हाउस को अपने निजी परिवार और अरबपति मित्रों के मुनाफे का अड्डा बना दिया है। फारस की खाड़ी में बिना संसद की मंजूरी के शुरू किए गए सैन्य अभियान, होर्मुज के आसपास रक्षा खर्चों की अपारदर्शिता, सेना के शीर्ष नेतृत्व में बार-बार किए गए अप्रत्याशित फेरबदल और महंगाई पर काबू पाने में नाकामी को डेमोक्रेट्स 'संस्थागत भ्रष्टाचार' के सीधे प्रमाण के रूप में पेश कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यही असंतोष बना रहा, तो निर्दलीय और तटस्थ मतदाता मध्यावधि चुनावों में ट्रंप की नीतियों को कड़ा दंड दे सकते हैं।

भारत, उत्तर प्रदेश और उन्नाव-कानपुर के प्रवासी समाज व व्यापार पर क्या होगा इसका असर?

अमेरिका के इस आंतरिक राजनीतिक मंथन और नीतिगत अनिश्चितता का प्रभाव केवल अटलांटिक पार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा संबंध भारत और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के आर्थिक व प्रवासी तंत्र से भी जुड़ता है। भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी बहुत गहरी है, किंतु ट्रंप प्रशासन के अप्रत्याशित फैसलों और आंतरिक दबावों के कारण व्यापारिक नीतियों में लगातार अस्थिरता देखी जा रही है।

उत्तर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी कानपुर और उससे सटे उन्नाव परिक्षेत्र के लेदर, टेक्सटाइल, केमिकल और इंजीनियरिंग उद्योगों का एक बड़ा बाजार अमेरिका है। उन्नाव के दही चौकी व बंथरा और कानपुर के दादानगर से लाखों डॉलर के चमड़े के उत्पाद, जूते और सैडलरी का सामान अमेरिकी कंपनियों को निर्यात किया जाता है। जब अमेरिका में घरेलू राजनीति भ्रष्टाचार और महंगाई के इर्द-गिर्द सिमटने लगती है, तो वहां की सरकारें अक्सर लोकलुभावन और संरक्षणवादी (Protectionist) फैसले लेती हैं, जैसे टैरिफ बढ़ाना या आयात पर अंकुश लगाना। इसके अलावा, लखनऊ, कानपुर और उन्नाव से हजारों की संख्या में आईटी प्रोफेशनल्स, शोधार्थी और छात्र अमेरिका में सिलिकॉन वैली, न्यू जर्सी, टेक्सास और शिकागो में कार्यरत हैं। एच-1बी (H-1B) वीजा नियमों में सख्ती, इमिग्रेशन नीतियों में अचानक बदलाव और अमेरिकी संस्थानों में बढ़ती अविश्वास की भावना वहां रहने वाले भारतीय मूल के परिवारों और छात्रों के भविष्य को लेकर गहरी चिंता पैदा करती है।

जब किसी राष्ट्र की जनता का अपनी ही सरकार के शीर्ष संस्थानों से भरोसा उठ जाता है, तो कानून का शासन और आर्थिक स्थिरता दोनों ही खतरे में पड़ जाते हैं। 89 प्रतिशत नागरिकों का आक्रोश यह स्पष्ट संदेश दे रहा है कि दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के भीतर नीतिगत शुचिता और पारदर्शी शासन की मांग अब तक के सबसे उग्र दौर में पहुंच चुकी है।