पृथ्वी से 16 लाख KM दूर गहरे अंतरिक्ष में भेजा अत्याधुनिक टेलीस्कोप, ब्रह्मांड के जन्म और एलियन जीवन का सबसे बड़ा रहस्य खोलने की तैयारी
मानव इतिहास की सबसे बड़ी जिज्ञासा—'क्या इस अनंत ब्रह्मांड में हम अकेले हैं?'—का निर्णायक उत्तर खोजने के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास का सबसे महत्वाकांक्षी और साहसिक कदम उठाया है। नासा ने पृथ्वी की कक्षा से बहुत दूर, लगभग 16 लाख किलोमीटर (10 लाख मील) की दूरी पर स्थित अंतरिक्ष के अत्यंत रहस्यमयी और स्थिर बिंदु 'सेकंड लैग्रेंज प्वाइंट' (L2) पर अपनी शक्तिशाली स्पेस ऑब्जर्वेटरी (टेलीस्कोप) को सफलतापूर्वक तैनात किया है। यह टेलीस्कोप केवल ग्रहों और तारों की सामान्य तस्वीरें खींचने का उपकरण नहीं है, बल्कि यह समय में अरबों साल पीछे देखने और सुदूर तारामंडलों में 'दूसरी दुनिया' यानी रहने योग्य एक्सोप्लैनेट्स (Exoplanets) के सूक्ष्म वायुमंडल को खंगालने वाली एक आधुनिक अंतरिक्षीय प्रयोगशाला है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में घूमने वाले पुराने हबल टेलीस्कोप की तुलना में यह नई वेधशाला पृथ्वी से लगभग चार गुना अधिक दूरी पर है, जो चांद की दूरी से भी लगभग चार गुना ज्यादा है। इतनी अत्यधिक दूरी पर टेलीस्कोप को स्थापित करने का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य से निकलने वाले भारी ताप और प्रकाश के व्यवधान से दूर रहकर ब्रह्मांड के सबसे ठंडे और सुदूर कोनों से आने वाली अत्यंत क्षीण इन्फ्रारेड (अवरक्त) किरणों को बिना किसी बाधा के कैप्चर करना है। यह वेधशाला अब सीधे अंतरिक्ष के उस अंधेरे महासागर में झांक रही है, जहां आज तक किसी भी इंसानी तकनीक की पहुंच नहीं हो सकी थी।
'दूसरी दुनिया' की तलाश: क्या सौरमंडल के बाहर मौजूद है जीवन? बायोसिग्नेचर की होगी सटीक पहचान
नासा के इस महामिशन का सबसे रोमांचक और प्राथमिक उद्देश्य सौरमंडल के बाहर स्थित उन 'एक्सोप्लैनेट्स' की खोज और उनका गहन अध्ययन करना है जो अपने मातृ तारे के 'गोल्डीलॉक्स जोन' (रहने योग्य क्षेत्र) में परिक्रमा कर रहे हैं। गोल्डीलॉक्स जोन किसी तारे के चारों ओर का वह विशेष क्षेत्र होता है जहां न तो अत्यधिक गर्मी होती है और न ही बहुत ज्यादा ठंड, जिससे वहां किसी चट्टानी ग्रह की सतह पर तरल रूप में जल मौजूद रहने की पूरी संभावना बनती है।
यह अत्याधुनिक टेलीस्कोप अपनी उच्च-क्षमता वाली ट्रांसमिशन स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक के माध्यम से तब ग्रहों का विश्लेषण करता है जब वे अपने तारे के ठीक सामने से गुजरते हैं। इस दौरान तारे की रोशनी जब उस ग्रह के वायुमंडल को पार करके टेलीस्कोप के शक्तिशाली सेंसरों तक पहुंचती है, तो वैज्ञानिक उस प्रकाश के स्पेक्ट्रम का विश्लेषण कर यह पता लगा लेते हैं कि उस ग्रह की हवा में कौन-कौन सी गैसें मौजूद हैं। वैज्ञानिक विशेष रूप से जलवाष्प (Water Vapour), कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, ओजोन और डाईमिथाइल सल्फाइड (DMS) जैसे 'बायोसिग्नेचर' और 'केमिकल फिंगरप्रिंट्स' की तलाश कर रहे हैं। यदि किसी सुदूर ग्रह पर इन गैसों का एक निश्चित रासायनिक संतुलन पाया जाता है, तो यह इस बात का अकाट्य वैज्ञानिक प्रमाण होगा कि उस ग्रह पर सूक्ष्मजीव या किसी न किसी रूप में जैविक जीवन धड़क रहा है।
13.5 अरब साल पीछे देखने की क्षमता: 'कॉस्मिक डॉन' और पहले तारों के जन्म का खुलेगा रहस्य
यह वेधशाला केवल दूसरी दुनिया के जीवन की तलाश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भौतिकी के नियमों का उपयोग करके एक 'टाइम मशीन' की तरह भी काम करती है। चूंकि प्रकाश को अंतरिक्ष में अरबों प्रकाश वर्ष की यात्रा करने में समय लगता है, इसलिए जब यह टेलीस्कोप 13.5 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित प्रकाश को देखता है, तो वह वास्तव में ब्रह्मांड के उस स्वरूप को देख रहा होता है जैसा वह बिग बैंग (महाविस्फोट) के ठीक बाद 'कॉस्मिक डॉन' (ब्रह्मांडीय भोर) के समय मौजूद था।
ब्रह्मांड के विस्तार के कारण सबसे पुरानी आकाशगंगाओं और पहले तारों से निकलने वाला प्रकाश समय के साथ खिंचकर दृश्य प्रकाश (Visible Light) से इन्फ्रारेड तरंगदैर्ध्य में बदल चुका है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'रेडशिफ्ट' (Redshift) कहा जाता है। नासा के इस टेलीस्कोप में लगे अत्यंत संवेदनशील क्रायोजेनिक इन्फ्रारेड कैमरे उस आदिम प्रकाश को भी स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड करने में सक्षम हैं। इससे वैज्ञानिक यह समझ सकेंगे कि बिग बैंग के बाद ब्रह्मांड में पहली आकाशगंगाएं, पहले ब्लैक होल और भारी तत्व कैसे बने, जिन्होंने आगे चलकर सौरमंडलों और जीवन के निर्माण की नींव रखी।
अंतरिक्ष का शून्य तापमान और सोने की परत वाला विशाल दर्पण: क्यों खास है यह ऑब्जर्वेटरी?
इस वेधशाला की तकनीकी संरचना मानव इंजीनियरिंग का एक अद्भुत चमत्कार है। इसके मुख्य प्रकाश संग्राहक दर्पण (Primary Mirror) को 18 षट्कोणीय (Hexagonal) खंडों को जोड़कर बनाया गया है, जो हल्के और मजबूत बेरिलियम धातु से बने हैं। प्रकाश के परावर्तन को उच्चतम स्तर पर ले जाने के लिए इन दर्पणों पर शुद्ध सोने (Gold) की बेहद पतली परत चढ़ाई गई है, क्योंकि सोना इन्फ्रारेड किरणों को 98 प्रतिशत से अधिक दक्षता के साथ परावर्तित करता है।
टेलीस्कोप को अत्यधिक ठंडे वातावरण में काम करने की आवश्यकता होती है, क्योंकि यदि टेलीस्कोप स्वयं गर्म होगा, तो उसका अपना थर्मल रेडिएशन सुदूर अंतरिक्ष से आने वाले धुंधले संकेतों को ढक देगा। इस समस्या से निपटने के लिए नासा ने इसमें एक टेनिस कोर्ट के आकार की 5-परत वाली विशाल 'सनशील्ड' (सनवाइजर) लगाई है। यह सनशील्ड एक तरफ से सूर्य की भीषण गर्मी को रोकती है, जिससे टेलीस्कोप के वैज्ञानिक उपकरणों का तापमान माइनस 233 डिग्री सेल्सियस (माइनस 388 डिग्री फारेनहाइट) तक ठंडा बना रहता है। यह तापमान परम शून्य (Absolute Zero) के बेहद करीब है, जो इसे अंतरिक्ष की गहराइयों को पढ़ने की असीम शक्ति प्रदान करता है।
क्या इंसान ढूंढ पाएगा 'पृथ्वी 2.0'? अंतरिक्ष विज्ञान में एक नए युग का आगाज
नासा के वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों में यह मिशन ब्रह्मांड को लेकर हमारी समझ को पूरी तरह बदल कर रख देगा। ट्रैपिस्ट-1 (TRAPPIST-1), के2-18बी (K2-18b) और प्रॉक्सिमा सेंटॉरी बी जैसे करीबी और संभावित रहने योग्य ग्रहों के वायुमंडल का जो डेटा यह टेलीस्कोप भेज रहा है, उसने खगोलविदों के बीच एक नया उत्साह भर दिया है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस सदी के मध्य तक इंसान सौरमंडल के बाहर 'पृथ्वी 2.0' यानी हमारे जैसे ही नीले और जीवन से भरपूर ग्रह को ढूंढ निकालने में सफल हो जाएगा।
यह मिशन इस बात का भी प्रमाण है कि मानव जाति अब केवल अपने ग्रह तक सीमित रहने वाली प्रजाति नहीं रह गई है, बल्कि वह ब्रह्मांडीय स्तर पर अपनी उपस्थिति और अपने अस्तित्व के मूल कारणों को खोजने के लिए सक्षम हो चुकी है। 16 लाख किलोमीटर दूर शून्य में तैरता यह टेलीस्कोप जब भी ब्रह्मांड के किसी नए रहस्य से पर्दा उठाता है, तो वह पूरी मानव सभ्यता को एक नए वैज्ञानिक युग की ओर अग्रसर कर देता है। आने वाले समय में प्राप्त होने वाले डेटा से यह तय होगा कि क्या हम इस विशाल ब्रह्मांड में वाकई अकेले हैं या फिर अनगिनत तारों के आंगन में कोई दूसरी दुनिया भी हमारी ओर टकटकी लगाए देख रही है।