भारत को आंखें दिखा रहा था अमेरिका, अब खुद पुतिन से खरीदेगा कच्चा तेल! ट्रंप का बड़ा दावा- मॉस्को से हो गई डील

भारत को आंखें दिखा रहा था अमेरिका, अब खुद पुतिन से खरीदेगा कच्चा तेल! ट्रंप का बड़ा दावा- मॉस्को से हो गई डील

वैश्विक भू-राजनीति और ऊर्जा बाजार में एक ऐसा अप्रत्याशित कूटनीतिक मोड़ देखने को मिला है जिसने पश्चिमी देशों के दोहरे रवैये की कलई खोलकर रख दी है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से ही जो अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी देश भारत द्वारा रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल (Russian Crude Oil) खरीदने पर लगातार नैतिक उपदेश दे रहे थे, प्रतिबंधों की धमकियां जारी कर रहे थे और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे, अब उसी वॉशिंगटन ने खुद मॉस्को के साथ तेल का सौदा करने का ऐलान कर दिया है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक मंच से घोषणा की है कि उनकी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ ऊर्जा आपूर्ति और कच्चे तेल को लेकर सीधी बातचीत हो चुकी है और दोनों पक्षों के बीच डील पक्की हो गई है। इस सनसनीखेज बयान ने यूरोप, नाटो और एशियाई कूटनीतिक हलकों में भारी खलबली मचा दी है।

ट्रंप का दावा: पुतिन से सीधी बातचीत और ऊर्जा संकट खत्म करने का फॉर्मूला

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने हालिया सार्वजनिक संबोधन और मीडिया इंटरव्यू में बेबाक अंदाज में कहा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बेलगाम महंगाई और ऊर्जा संकट से बाहर निकालने के लिए रूस के विशाल ऊर्जा संसाधनों का उपयोग करना सबसे व्यावहारिक कदम है। ट्रंप के अनुसार, मौजूदा अमेरिकी प्रशासन की गलत नीतियों और प्रतिबंधों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने अमेरिकी जनता के लिए पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान पर पहुंचा दिए हैं, जबकि रूस ने अपने तेल का रुख चीन और भारत की तरफ मोड़कर अपना खजाना भर लिया। ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने सीधे व्लादिमीर पुतिन से संवाद साधा और युद्ध समाप्ति व आर्थिक सामान्यीकरण के तहत रूस से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष माध्यमों से क्रूड ऑयल खरीदने की सहमति बना ली है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को भरने और घरेलू ईंधन की कीमतें घटाने के लिए सस्ती ऊर्जा खरीदने से पीछे नहीं हटेगा।

भारत पर पश्चिमी दबाव और नई दिल्ली का अडिग रुख: इतिहास ने साबित किया सही

इस नए घटनाक्रम के सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विश्लेषकों ने भारत के विदेश नीति के रुख की ऐतिहासिक जीत का उल्लेख करना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों में जब पश्चिमी मीडिया और अमेरिकी अधिकारियों ने भारत पर रूसी तेल खरीदकर मास्को के युद्ध प्रयासों को वित्तपोषित करने के बेबुनियाद आरोप लगाए थे, तब भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने दुनिया के सामने दो टूक जवाब दिया था। भारत ने स्पष्ट कहा था कि 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का पहला राष्ट्रीय कर्तव्य है और यूरोपीय देश खुद जितना तेल और गैस रूस से खरीद रहे थे, उसकी तुलना में भारत की खरीद बहुत कम थी। आज जब अमेरिका खुद उसी रूसी तेल के लिए दरवाजे खोलने को तैयार खड़ा दिख रहा है, तो यह साफ हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आदर्शवाद केवल दूसरों पर दबाव बनाने का मुखौटा होता है, जबकि असल फैसले सिर्फ और सिर्फ 'राष्ट्रीय स्वार्थ' पर आधारित होते हैं।

यूरोपीय देशों में बेचैनी: प्रतिबंधों के खोखलेपन पर उठे गंभीर सवाल

ट्रंप के इस बयान ने यूरोपीय संघ (EU) के देशों की नींद उड़ा दी है। यूरोप ने अमेरिका के भारी दबाव में आकर सस्ती रूसी पाइपलाइन गैस और तेल का बहिष्कार कर दिया था, जिसके चलते जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों की विनिर्माण इकाइयां ठप हो गईं और उन्हें भारी ऊर्जा महंगाई का सामना करना पड़ा। यूरोपीय देशों ने अमेरिका से महंगी एलएनजी (LNG) खरीदी और अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मंदी की कगार पर धकेल दिया। अब जब अमेरिका खुद रूस के साथ सीधी डील करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो ब्रुसेल्स और अन्य यूरोपीय राजधानियों में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या प्रतिबंधों की पूरी नीति केवल यूरोपीय महाद्वीप को कमजोर करने और अमेरिकी ऊर्जा लॉबी को फायदा पहुंचाने का खेल थी।

ओपेक प्लस और ग्लोबल ऑयल मार्केट पर इस समझौते का संभावित असर

यदि अमेरिका और रूस के बीच यह तेल व्यापार औपचारिक आकार लेता है, तो वैश्विक कमोडिटी बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा फेरबदल देखने को मिलेगा। वर्तमान में ओपेक प्लस (OPEC+) गठबंधन तेल उत्पादन में कटौती करके ब्रेंट क्रूड की कीमतों को नियंत्रित रखने का प्रयास कर रहा है। रूस द्वारा पश्चिमी बाजारों में प्रत्यक्ष आपूर्ति फिर से शुरू होने से वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति बढ़ेगी, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 70 से 65 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक फिसल सकती हैं। इससे भारत जैसे प्रमुख तेल आयातक देशों को भी फायदा होगा क्योंकि वैश्विक स्तर पर तेल सस्ता होने से घरेलू महंगाई घटेगी और आयात बिल में भारी राहत मिलेगी।

महाशक्तियों की कूटनीति का कड़वा सच: दोस्त या दुश्मन कोई स्थायी नहीं, सिर्फ हित सर्वोपरि

अमेरिका और रूस के बीच उभरती इस समझ ने एक बार फिर से इस चिरंतन कूटनीतिक सिद्धांत पर मुहर लगा दी है कि 'अंतरराष्ट्रीय राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न कोई स्थायी शत्रु, सिर्फ स्थायी राष्ट्रीय हित होते हैं।' भारत के खिलाफ पाबंदियों का डर दिखाने वाले वाशिंगटन का यह दोहरा चेहरा विकासशील दुनिया के लिए एक बड़ा सबक है। भारत ने जिस आत्मनिर्भरता, रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्र विदेश नीति का प्रदर्शन करते हुए दुनिया के दबाव के आगे झुकने से इनकार किया था, आज उसी राह पर महाशक्तियां भी चलने को मजबूर हो रही हैं।