'रामलीला मैदान को हल्के में मत लेना': जब-जब यहां से गूंजा जनसैलाब, तब-तब हिलीं कांग्रेस सरकारों की जड़ें

'रामलीला मैदान को हल्के में मत लेना': जब-जब यहां से गूंजा जनसैलाब, तब-तब हिलीं कांग्रेस सरकारों की जड़ें

देश की राजधानी दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के आधिकारिक नक्शे में हुए बड़े बदलाव—जिसमें दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को डिनोटिफाई कर रामलीला मैदान को प्रमुख आंदोलन स्थल के रूप में निर्धारित किया है—ने एक बार फिर दिल्ली गेट और अजमेरी गेट के बीच फैले इस विशाल ऐतिहासिक मैदान के सियासी रसूख को सुर्खियों में ला दिया है। भारतीय राजनीति में यह कहावत आम है कि सत्ता के गलियारे भले ही रायसीना हिल्स से चलते हों, लेकिन उस सत्ता को उखाड़ फेंकने का बिगुल अक्सर रामलीला मैदान से ही फूंका जाता है। आधुनिक भारत के लोकतांत्रिक इतिहास पर नजर डालें, तो 36 वर्षों के फासले पर इसी मैदान से उठे दो विशाल जनआंदोलनों ने केंद्र में पूर्ण बहुमत और मजबूत स्थिति में बैठी तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के सिंहासन को हिलाकर रख दिया था।

1. 25 जून 1975: जब जेपी की एक हुंकार से इंदिरा गांधी ने लगा दी थी इमरजेंसी

रामलीला मैदान का सबसे ऐतिहासिक और निर्णायक मोड़ 25 जून 1975 को आया। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रायबरेली चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द किए जाने के बाद देश में राजनीतिक उबाल था।

  • 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है': लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, चौधरी चरण सिंह और चंद्रशेखर जैसे तमाम विपक्षी दलों के दिग्गजों ने रामलीला मैदान में एक लाख से अधिक लोगों की ऐतिहासिक रैली को संबोधित किया।

  • संपूर्ण क्रांति का आह्वान: इसी मैदान पर जेपी ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की मशहूर पंक्ति "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" पढ़कर 'संपूर्ण क्रांति' का शंखनाद किया था।

  • आधी रात को आपातकाल: इस विशाल रैली के जनसैलाब और उसके असर से घबराकर उसी रात (25-26 जून 1975 की दरमियानी रात) देश में आपातकाल (Emergency) लागू कर दिया गया और विपक्षी नेताओं को सलाखों के पीछे भेज दिया गया।

  • 1977 में कांग्रेस की पहली ऐतिहासिक हार: इमरजेंसी हटने के बाद फरवरी 1977 में फिर इसी रामलीला मैदान में जनता पार्टी का गठन हुआ और 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस को आजादी के बाद पहली बार केंद्र की सत्ता से बेदखल होना पड़ा।

2. अगस्त 2011: अन्ना हजारे का 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' और यूपीए-2 का पतन

ठीक 36 साल बाद, साल 2011 में इतिहास ने खुद को एक बार फिर रामलीला मैदान की उसी लाल मिट्टी पर दोहराया। 2जी स्पेक्ट्रम और कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे घोटालों के आरोपों से जूझ रही मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ समाज सेवी अन्ना हजारे ने जनलोकपाल बिल की मांग को लेकर मोर्चा खोला।

  • जंतर-मंतर से रामलीला मैदान का रुख: अन्ना हजारे का यह आंदोलन पहले जंतर-मंतर से शुरू हुआ था, लेकिन जैसे-जैसे युवाओं और आम नागरिकों की भीड़ लाखों में तब्दील हुई, इसे रामलीला मैदान में स्थानांतरित करना पड़ा।

  • 12 दिनों का ऐतिहासिक अनशन: अगस्त 2011 में अन्ना हजारे के ऐतिहासिक भूख हड़ताल के दौरान रामलीला मैदान देश भर के जनआक्रोश का मुख्य केंद्र बन गया। तिरंगा थामे लाखों नागरिकों, छात्रों और कर्मचारियों के रेले ने केंद्र सरकार को संसद का विशेष सत्र बुलाकर प्रस्ताव पारित करने पर विवश कर दिया।

  • एक नई पार्टी का जन्म और 2014 का तख्तापलट: इसी मैदान के आंदोलन से अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और प्रशांत भूषण जैसे चेहरों के साथ 'आम आदमी पार्टी' (AAP) का जन्म हुआ, जिसने दिल्ली में 15 साल पुराने शीला दीक्षित के कांग्रेस शासन को उखाड़ फेंका। साथ ही, इसी आंदोलन ने देश में जो भ्रष्टाचार विरोधी माहौल बनाया, उसी की परिणति 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के 44 सीटों के ऐतिहासिक निचले स्तर पर सिमटने के रूप में हुई।

इसी मैदान पर बाबा रामदेव का 'आधी रात का ऑपरेशन'

रामलीला मैदान की गाथा जून 2011 के उस काले पन्ने के बिना अधूरी है, जब योग गुरु बाबा रामदेव विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने की मांग को लेकर करीब 65,000 समर्थकों के साथ अनशन पर बैठे थे। 4-5 जून 2011 की आधी रात को दिल्ली पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागकर और लाठीचार्ज करके आंदोलनकारियों को जबरन खदेड़ दिया था। उस बर्बर पुलिस कार्रवाई ने मनमोहन सरकार के खिलाफ जनाक्रोश को और ज्यादा हवा दी थी।

सांस्कृतिक पहचान से राजनीतिक बैरोमीटर तक

ब्रिटिश काल में एक विशाल तालाब के रूप में मौजूद रहे इस मैदान ने आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल की सभाएं देखीं। 1965 में इसी मैदान से तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश को 'जय जवान, जय किसान' का अमर नारा दिया था। 1963 में भारत-चीन युद्ध के बाद लता मंगेशकर ने नेहरू की मौजूदगी में यहीं 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गाकर देश की आंखें नम की थीं।

आज जब जंतर-मंतर से हटकर विरोध प्रदर्शनों को फिर से रामलीला मैदान भेजने की बात हो रही है, तो इतिहासकार और राजनीतिक पंडित याद दिला रहे हैं कि यह कोई साधारण खाली मैदान नहीं है। यह वह स्थान है जहां जब देश का आम नागरिक अपनी आवाज बुलंद करता है, तो बड़े-से-बड़े मजबूत सियासी किलों की दीवारें ढह जाती हैं।