'भारत जो करता है उसका क्रेडिट कभी नहीं चाहता, न शून्य की रॉयल्टी मांगी': ब्लूमबर्ग फोरम में PM मोदी का दुनिया को बड़ा संदेश

'भारत जो करता है उसका क्रेडिट कभी नहीं चाहता, न शून्य की रॉयल्टी मांगी': ब्लूमबर्ग फोरम में PM मोदी का दुनिया को बड़ा संदेश

वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल, आपूर्ति श्रृंखलाओं में अविश्वास और आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया को भारत के विकास दर्शन और वसुधैव कुटुंबकम की भावना का कड़ा संदेश दिया है। नई दिल्ली में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत की तरक्की किसी दूसरे देश को नुकसान पहुंचाकर नहीं, बल्कि पूरी मानवता को साथ लेकर चलने पर टिकी है। पीएम मोदी ने कहा कि भारत 'पावर टू एम्पावर' (दूसरों को सशक्त बनाने की शक्ति) के सिद्धांत पर विश्वास करता है। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि भारत ने दुनिया को 'शून्य' (Zero) दिया जिससे पूरी मानव सभ्यता समृद्ध हुई, लेकिन भारत ने कभी उसके लिए दुनिया से 'रॉयल्टी' नहीं मांगी, और आज भी भारत इसी निस्वार्थ सेवा भाव से वैश्विक चुनौतियों का समाधान पेश कर रहा है।

'हम दूसरों की कीमत पर नहीं, दुनिया के लिए बढ़ते हैं आगे'

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि जब भी दुनिया को एक स्थिर स्तंभ (Steady Pillar) की आवश्यकता होती है, भारत अपना वैश्विक दायित्व समझते हुए सबसे पहले हाथ आगे बढ़ाता है। उन्होंने कहा, "हम दूसरों की कीमत पर आगे नहीं बढ़ते। हम दुनिया के साथ और दुनिया के लिए आगे बढ़ते हैं (We grow with the world and for the world)। और साथियों, भारत जो करता है उसका क्रेडिट कभी नहीं चाहता। दुनिया गर्व से स्वीकार करती है कि भारत ने शून्य दिया, पर भारत ने कभी रॉयल्टी का दावा नहीं किया। आज भी हमारी सोच वही है। चाहे कोरोना संकट में टीकों की आपूर्ति हो, डिजिटल भुगतान का मजबूत यूपीआई मॉडल हो या कुशल प्रतिभाएं—जरूरत के समय दुनिया ने हमेशा भारत पर भरोसा जताया है।"

अविश्वास के दौर में भारत बना स्थिरता का प्रतीक

आज के वैश्विक परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट 'भरोसे' (Trust Deficit) का है। देश यह सोचने पर मजबूर हैं कि संकट के समय वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं जारी रहेंगी या नहीं और साझेदार देश साथ खड़े रहेंगे या मुंह मोड़ लेंगे। खनिज संसाधन, वित्तीय भुगतान प्रणालियां और अत्याधुनिक तकनीकें—जो कभी दुनिया को जोड़ने के माध्यम थीं—आज दबाव और रणनीतिक दबदबे का हथियार बनाई जा रही हैं। ऐसे दौर में भारत जोड़ने और जुड़ने पर बल देता है। इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA), बिग कैट अलायंस और कोएलिशन फॉर डिजास्टर रिजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) जैसी भारतीय पहलें केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को साझा मंच देने के लिए बनाई गई हैं।

आर्थिक मजबूती के ठोस आंकड़े: 0.61% पर आया चालू खाता घाटा

प्रधानमंत्री ने पिछले एक दशक में भारत के आर्थिक रूपांतरण के ठोस आंकड़े दुनिया के सामने रखे:

  • चालू खाता घाटा (CAD) में भारी गिरावट: 12-13 साल पहले चालू खाता घाटा जीडीपी के 4 प्रतिशत से भी अधिक के खतरनाक स्तर पर था, जो अब घटकर मात्र 0.61 प्रतिशत रह गया है।

  • विदेशी मुद्रा भंडार: भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर को पार कर चुका है, जो बाहरी झटकों से देश को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है।

  • बैंकिंग और रेटिंग सुधार: देश का बैंकिंग ढांचा पहले से कहीं अधिक मजबूत और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) से मुक्त हुआ है, जिसके चलते दुनिया भर की क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भारत की 'सॉवरेन रेटिंग' अपग्रेड कर रही हैं।

  • रिफॉर्म एक्सप्रेस की रफ्तार: जीएसटी (GST), दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) और श्रम संहिताओं (Labor Codes) जैसे संरचनात्मक सुधारों के चलते भारत में निवेश करना पहले से कहीं अधिक सुगम और सुरक्षित हुआ है।

'सं गच्छध्वं, सं वदध्वं': ऋग्वेद के मंत्र से साझा भविष्य का आह्वान

प्रधानमंत्री ने 21वीं सदी को ध्रुवीकरण और एकाधिकार के बजाय सामूहिक सह-अस्तित्व की सदी बताते हुए ऋग्वेद के अमर श्लोक—'सं गच्छध्वं, सं वदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्' (हम सब साथ चलें, एक सुर में बोलें और सबके मन एक साथ विचार करें)—का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि खंडित होती दुनिया को जोड़ने के लिए यही एकमात्र रास्ता है। भारत इसी मार्ग पर अग्रसर है और बिना किसी व्यक्तिगत श्रेय की लालसा के मानवता के कल्याण के लिए अपना योगदान देता रहेगा।