बॉक्सर से नशा विरोधी योद्धा बने परविंदर झोटा: अंधेरे दलदल से निकलकर नशे के सौदागरों के खिलाफ छेड़ी निर्णायक जंग
पंजाब के मालवा अंचल का मानसा जिला, जो कभी अपनी ऐतिहासिक और किसानी पहचान के लिए जाना जाता था, पिछले कुछ वर्षों में एक अनोखे और साहसी जनआंदोलन का केंद्र बन गया। इस बदलाव के केंद्र में एक ही नाम गूंजता है—परविंदर सिंह झोटा। एक ऐसा नौजवान जो कभी बॉक्सिंग रिंग के भीतर अपने मुक्कों से विरोधियों को धूल चटाता था, लेकिन जिंदगी की एक गलत दिशा ने उसे सिंथेटिक नशे यानी 'चिट्टे' की भयानक गर्त में धकेल दिया। अधिकांश लोग जब इस दलदल में फंसते हैं, तो उनकी कहानी खामोशी और बर्बादी के साथ खत्म हो जाती है, मगर परविंदर ने न केवल अपनी इच्छाशक्ति से नशे की बेड़ियों को तोड़ा, बल्कि बाहर निकलकर उन सौदागरों के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया जो पंजाब की युवा पीढ़ी की नस-नस में जहर घोल रहे थे। आज उनकी कहानी पंजाब के गांव-गांव में उम्मीद और संघर्ष की सबसे बड़ी मिसाल बन चुकी है।
बॉक्सिंग रिंग का मेडल विजेता जब नशे के जाल में फंसा
परविंदर सिंह झोटा का शुरुआती जीवन खेलों और कड़े अनुशासन के बीच बीता। शारीरिक रूप से बेहद मजबूत और फुर्तीले परविंदर ने मुक्केबाजी को अपना जुनून बनाया और अपनी मेहनत के दम पर कई स्थानीय व राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में पदकों पर कब्जा जमाया। उनके भारी-भरकम शरीर और बेखौफ अंदाज के कारण साथी खिलाड़ी उन्हें 'झोटा' उपनाम से पुकारने लगे। हालांकि, बुरी संगत और पंजाब के ग्रामीण इलाकों में आसानी से मिलने वाले सिंथेटिक ड्रग्स के नेटवर्क ने इस चमकते खिलाड़ी को अपनी गिरफ्त में ले लिया। जो हाथ मुक्केबाजी के दस्ताने पहनकर देश का नाम रोशन करने का सपना देख रहे थे, वे धीरे-धीरे मेडिकल नशे और चिट्टे के शिकार हो गए। खेल छूट गया, परिवार की उम्मीदें बिखरने लगीं और परविंदर एक ऐसे मुहाने पर पहुंच गए जहां जिंदगी और मौत के बीच का फासला बेहद कम रह जाता है।
आत्ममंथन और दलदल से बाहर निकलने की फौलादी जिद
कई साल नशे के भयानक अंधेरे में बिताने के बाद परविंदर ने अपने आसपास के दर्जनों हमउम्र साथियों को ओवरडोज से दम तोड़ते देखा। उजड़ते हुए परिवारों और माताओं के आंसुओं ने उनके भीतर सोए हुए खिलाड़ी को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने ठान लिया कि वे इस जिल्लत भरी जिंदगी को खत्म करेंगे। बिना किसी महंगे रीहैब सेंटर के, केवल परिवार के सहयोग और अपनी अटूट आत्मशक्ति के बल पर उन्होंने विथड्रॉल सिंड्रोम के असहनीय दर्द को झेला। हफ्तों तक चलने वाली शारीरिक पीड़ा, बेचैनी और मानसिक टूटन को मात देकर परविंदर पूरी तरह नशामुक्त होकर बाहर निकले। नशे पर इस व्यक्तिगत जीत ने उनके भीतर एक नया संकल्प पैदा किया कि जिस आग में वे खुद झुलसे थे, उसमें अब किसी और नौजवान को जलने नहीं देंगे।
गली-मोहल्लों में नशा तस्करों को पकड़ने की सीधी मुहिम
पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद परविंदर झोटा ने मानसा शहर और आसपास के गांवों में नशा विरोधी मुहिम की शुरुआत की। उन्होंने युवाओं को एकजुट किया और सोशल मीडिया को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। वे रात-बिरात उन अड्डों पर छापा मारने लगे जहां खुलेआम नशीली गोलियां, टीके और चिट्टा बेचा जाता था। परविंदर का तरीका सीधा और जमीनी था—वे नशा बेचने वालों को रंगे हाथों पकड़ते, उनके पास से मिलने वाले नशीले पदार्थों का लाइव वीडियो बनाते और जनता के सामने उनका पर्दाफाश करते। वे तस्करों को पड़कर स्थानीय पुलिस के हवाले कर देते। कुछ ही महीनों में परविंदर की इस निडरता ने गांव के बुजुर्गों, महिलाओं और युवाओं में विश्वास जगा दिया कि अगर जनता एकजुट हो जाए, तो बड़े से बड़े तस्कर के पैर उखड़ सकते हैं।
विवाद, पुलिस से टकराव और जेल की सलाखें
जमीनी स्तर पर नशा तस्करों के खिलाफ सीधे एक्शन लेने की इस कार्यप्रणाली ने कई बार परविंदर झोटा को कानूनी पचड़ों में भी डाला। पुलिस प्रशासन का कहना था कि कानून हाथ में लेना और लोगों को सरेआम बेइज्जत करना न्यायसंगत नहीं है। एक मामले में नशा बेचने के आरोपी एक मेडिकल स्टोर संचालक के साथ हाथापाई और उसे सार्वजनिक रूप से घुमाने के आरोप में मानसा पुलिस ने परविंदर झोटा के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया। इस गिरफ्तारी के बाद मानसा में ऐसा जनाक्रोश फूटा जिसकी मिसाल कम ही देखने को मिलती है। हजारों की तादाद में आम लोग, महिलाएं और किसान यूनियनें सड़कों पर उतर आईं। शहर में कई दिनों तक प्रदर्शन हुए और नारे लगे कि नशा बेचने वाले खुले घूम रहे हैं जबकि उन्हें पकड़ने वाले को सलाखों के पीछे डाला जा रहा है। भारी जनदबाव और कानूनी लड़ाई के बाद जब परविंदर जमानत पर बाहर आए, तो हजारों लोगों ने फूल-मालाओं के साथ उनका इस्तकबाल किया।
'इलाज और प्यार' बनाम 'तस्करी पर प्रहार' का दर्शन
परविंदर झोटा की मुहिम का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि वे नशा करने वाले पीड़ित और नशा बेचने वाले मुजरिम के बीच स्पष्ट फर्क करते हैं। उनका साफ मानना है कि जो युवा नशे की गिरफ्त में हैं, वे अपराधी नहीं बल्कि बीमार हैं, जिन्हें समाज के साथ, प्यार और अच्छे इलाज की जरूरत है। परविंदर ने अपने स्तर पर दर्जनों युवाओं को नशामुक्ति केंद्रों में भर्ती कराया, उनके इलाज का खर्च जुटाने में मदद की और ठीक होने के बाद उन्हें जिम व खेलों से जोड़ा। वहीं दूसरी ओर, चंद पैसों के लिए युवाओं की जिंदगी बर्बाद करने वाले सप्लायर्स और तस्करों के प्रति उनका रुख बेहद आक्रामक और सख्त रहता है। उनका यह दोहरा दृष्टिकोण समाज के हर वर्ग के दिल को छू गया।
पंजाब के भविष्य के लिए एक मिसाल बन चुका संघर्ष
आज परविंदर झोटा केवल मानसा तक सीमित नहीं हैं; उनकी आवाज पूरे पंजाब में नशा विरोधी जनचेतना का प्रतीक बन चुकी है। वे स्कूल-कॉलेजों, गुरुद्वारों और सार्वजनिक मंचों पर जाकर युवाओं को अपनी आपबीती सुनाते हैं और बताते हैं कि कैसे एक बार का नशा इंसान का पूरा भविष्य लील जाता है। खेल के मैदान से निकलकर नशे के दलदल में धंसना और फिर वहां से उठकर एक सामाजिक क्रांति का नेतृत्व करना—परविंदर झोटा का जीवन साबित करता है कि गलतियों से सीखकर अगर इरादा पक्का कर लिया जाए, तो एक अकेला इंसान भी पूरे सिस्टम और समाज को नई दिशा दिखाने की ताकत रखता है। पंजाब की माटी को नशे से मुक्त कराने की उनकी यह लड़ाई आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत ढाल साबित हो रही है।