'दबंगई नहीं, संस्कार देखो': पोते को पिछड़ी जाति के दोस्त के साथ देख क्या बोले बृजभूषण शरण सिंह?
भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष और कैसरगंज से पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह अपने बेबाक और अक्सर तीखे बयानों को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। हाल ही में एक सार्वजनिक सभा और पारिवारिक बातचीत के संदर्भ में उनका एक निजी प्रसंग चर्चा में आया, जिसमें उन्होंने अपने पोते और उसके एक दोस्त के रिश्ते का जिक्र किया। यह वाकया उस समय का है जब उन्होंने अपने पोते को एक तथाकथित 'पिछड़ी जाति' (ओबीसी/दलित वर्ग) से ताल्लुक रखने वाले दोस्त के साथ कंधे से कंधा मिलाकर घूमते और वक्त बिताते देखा।
'दोस्ती में जात-पात नहीं, दिल देखा जाता है': क्या था बृजभूषण का बयान?
इस घटना का उल्लेख करते हुए बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि जब उन्होंने अपने पोते को उसके दोस्त के साथ देखा, तो उन्होंने बच्चे से पूछा कि यह कौन है। जब उन्हें पता चला कि वह उनके क्षेत्र के एक साधारण परिवार और पिछड़ी जाति से आता है, तो उन्होंने अपने पोते को डांटने या टोकने के बजाय उसकी पीठ थपथपाई।
बृजभूषण शरण सिंह ने कहा, "आज की पीढ़ी में यह सबसे अच्छी बात है कि वे जाति-पांति की संकीर्ण दीवारों से ऊपर उठकर रिश्ते निभाते हैं। मित्रता में न तो कोई अगड़ा होता है और न ही कोई पिछड़ा। अगर मेरा पोता किसी साधारण और पिछड़ी जाति के बच्चे को अपना सच्चा दोस्त मानता है, उसके साथ खाता-पीता और घूमता है, तो यह हमारे संस्कारों की ताकत है, न कि किसी कमजोरी की।"
सामाजिक समरसता और राजनीतिक संदेश
पूर्वांचल और अवध की राजनीति में बृजभूषण शरण सिंह का प्रभाव काफी गहरा माना जाता है। राजपूत समाज से आने वाले बृजभूषण पर अक्सर राजनीतिक विरोधी जातिवादी राजनीति के आरोप लगाते रहे हैं। ऐसे में अपने पारिवारिक दायरे से यह संदेश देकर उन्होंने यह जताने की कोशिश की कि उनका परिवार और वे खुद सभी वर्गों को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुश्ती और खेल के मैदान पर भी उन्होंने कभी किसी पहलवान की जाति नहीं देखी; जो पसीना बहाता है और अखाड़े में दम दिखाता है, वही आगे बढ़ता है।
सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर प्रतिक्रिया
बृजभूषण का यह बयान सामने आने के बाद उनके समर्थकों ने इसे सामाजिक समरसता और बराबरी का उदाहरण बताते हुए साझा किया। समर्थकों का कहना है कि पूर्व सांसद ने हमेशा स्थानीय स्तर पर हर वर्ग के लोगों की मदद की है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच गैर-सवर्ण और पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पकड़ और स्वीकार्यता मजबूत बनाए रखने के लिए इस तरह के संदेश काफी मायने रखते हैं।