यूपी चुनाव 2027 से पहले सपा-कांग्रेस गठबंधन में खींचतान: अखिलेश के 'विनेबिलिटी' फॉर्मूले पर कांग्रेस की 150 सीटों की मांग
उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर अभी से बिसात बिछाई जाने लगी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को कड़ी टक्कर देने वाले समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के गठबंधन में अब विधानसभा की 403 सीटों के बंटवारे को लेकर रार खुलकर सामने आने लगी है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जहां केवल 'जिताऊ उम्मीदवार' (विनेबिलिटी) के आधार पर ही सीट देने की बात कह रहे हैं, वहीं कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी सूरत में 150 से कम सीटों पर समझौता नहीं करेगी। दोनों दलों के नेताओं की ओर से हो रही तीखी बयानबाजी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या 2027 के महासमर से पहले 'इंडिया' गठबंधन में बड़ी दरार पड़ने जा रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रही समाजवादी पार्टी इस बार किसी भी तरह का जोखिम उठाने के मूड में नहीं है। अखिलेश यादव ने रायबरेली से अपनी 'पीडीए यात्रा' की शुरुआत करते हुए स्पष्ट संदेश दे दिया था कि 2022 वाली गलतियों को दोहराया नहीं जाएगा। सपा का स्पष्ट तर्क है कि गठबंधन में सीट हासिल करना कोई बड़ी बात नहीं है, असली चुनौती उस सीट पर बीजेपी को हराने वाले जिताऊ चेहरे को उतारने की है। इसके विपरीत, लोकसभा चुनाव में मिली 6 सीटों की संजीवनी के बाद कांग्रेस संगठन स्तर पर खुद को मजबूत आंक रही है और सम्मानजनक संख्याबल से कम पर राजी होने को तैयार नहीं दिख रही है।
अखिलेश यादव का 'विनेबिलिटी' फॉर्मूला: मजबूत उम्मीदवार ही होगा सीट का आधार
सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने गठबंधन के सहयोगियों के सामने स्पष्ट लाइन खींच दी है। उनका कहना है कि विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों, जातिगत समीकरणों और व्यक्तिगत प्रभाव पर लड़े जाते हैं। केवल कागजी गठबंधन या किसी दल के नाम पर सीटें बांटने से जीत नहीं मिलेगी। सपा सूत्रों का कहना है कि पार्टी कांग्रेस को करीब 45 से 50 सीटें ही देने के पक्ष में है। सपा का आंकलन है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का कैडर वोट बैंक ज्यादातर इलाकों में बेहद सीमित है।
अखिलेश यादव का जोर अपने सफल 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर है, जिसके दम पर उन्होंने लोकसभा में ऐतिहासिक बढ़त बनाई थी। सपा का तर्क यह भी है कि 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस को जो सीटें मिली थीं, उनमें से प्रयागराज और सीतापुर जैसी सीटों पर सपा पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को ही मैदान में उतारा गया था, तब जाकर जीत मिली। ऐसे में सपा नेतृत्व का मानना है कि जहां कांग्रेस के पास जमीन पर मजबूत और जीतने लायक चेहरे नहीं हैं, वहां सीटें छोड़ना सीधे-सीधे सत्ता पक्ष को वॉकओवर देने जैसा होगा।
कांग्रेस की जवाबी रणनीति: 150 सीटों की मांग और आक्रामक तेवर
दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी 2022 के विधानसभा चुनाव की कमजोरियों को पीछे छोड़ते हुए पूरी तरह आक्रामक रुख अपना रही है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी और वरिष्ठ नेताओं ने खुले तौर पर संकेत दिए हैं कि पार्टी राज्य में 150 से कम सीटों पर विचार नहीं करेगी। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने तीखे लहजे में कहा कि कांग्रेस किसी के दबाव या डराने से दबने वाली पार्टी नहीं है और राहुल गांधी के नेतृत्व में पूरे देश व प्रदेश में माहौल बदला है। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर गठबंधन में सम्मानजनक जगह नहीं मिली, तो कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह सक्षम है।
इसके अलावा, यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय लगातार समाजवादी पार्टी के पारंपरिक गढ़ माने जाने वाले मैनपुरी, इटावा, कन्नौज, आजमगढ़ और सैफई जैसे इलाकों में संगठन को सक्रिय करने और रैलियां निकालने की बात कर रहे हैं। कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी की राष्ट्रीय छवि और संविधान बचाओ अभियान के कारण मुस्लिम और दलित मतदाताओं का एक बड़ा तबका कांग्रेस की ओर लौटा है। ऐसे में पार्टी खुद को केवल 'जूनियर पार्टनर' के तौर पर सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि अपने जनाधार का विस्तार करने के लिए अधिक से अधिक सीटों पर लड़ना चाहती है।
शिवपाल यादव बनाम अजय राय: बयानों से गरमाया सियासी पारा
सीटों की इस खींचतान के बीच दोनों दलों के शीर्ष नेताओं में जुबानी जंग तेज हो गई है। कांग्रेस के बयानों पर पलटवार करते हुए सपा के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव ने तंज कसा कि कांग्रेस इटावा, मैनपुरी या सैफई में अपना संगठन बढ़ाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, लेकिन वहां उसे वोट नहीं मिलने वाले। शिवपाल यादव ने साफ कहा कि जमीन पर काम सपा के कार्यकर्ताओं ने किया है और जनता अखिलेश यादव के काम पर भरोसा करती है। प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने भी दो टूक कहा कि चुनाव जीतने के लिए लड़ा जाता है, सिर्फ संख्या बढ़ाने के लिए नहीं।
सपा नेताओं के इन तीखे हमलों पर कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सीटों का अंतिम फैसला लखनऊ में बैठकर नहीं, बल्कि दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान (मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी) और अखिलेश यादव की सीधी बातचीत में तय होगा। अजय राय ने स्पष्ट किया कि संगठन को मजबूत करना हर पार्टी का लोकतांत्रिक अधिकार है और इसमें किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए। नेताओं के इन सार्वजनिक बयानों से कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम और तल्खी बढ़ती दिख रही है।
2022 बनाम 2024 के आंकड़े: आंकड़ों के आईने में दोनों दलों का गणित
सीट बंटवारे के विवाद की जड़ में दोनों दलों द्वारा देखे जा रहे अलग-अलग आंकड़े हैं। सपा 2022 के विधानसभा चुनाव परिणामों को आधार बनाकर बात कर रही है। 2022 में कांग्रेस ने 400 से अधिक सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन पार्टी को मात्र 2 सीटों पर जीत मिली थी और उसका वोट शेयर गिरकर महज 2.39 प्रतिशत रह गया था। इसके विपरीत समाजवादी पार्टी 111 सीटें जीतकर 32.06 प्रतिशत वोट शेयर के साथ मुख्य मुकाबले में खड़ी थी। सपा का कहना है कि विधानसभा में कांग्रेस का धरातल बेहद कमजोर रहा है।
वहीं, कांग्रेस 2024 के लोकसभा नतीजों को अपना आधार बना रही है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने यूपी की 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6 सीटों पर शानदार जीत हासिल की। गठबंधन का कुल वोट शेयर 43.52 प्रतिशत रहा, जिसने बीजेपी को पीछे छोड़ दिया था। कांग्रेस का तर्क है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और सामाजिक न्याय के नैरेटिव ने पूरे राज्य का राजनीतिक मिजाज बदला है, इसलिए विधानसभा चुनाव में उसकी हिस्सेदारी और दावेदारी 2022 के मुकाबले कई गुना बढ़नी चाहिए।
आगे क्या होगी गठबंधन की राह: क्या सुलझेगा सीटों का पेच?
हालांकि सार्वजनिक मंचों पर दोनों दलों के नेता एक-दूसरे पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत बयानबाजी कर रहे हैं, लेकिन अंदरखाने दोनों ही दल जानते हैं कि अलग होकर चुनाव लड़ने से बीजेपी विरोधी मतों का बिखराव होगा, जिसका सीधा फायदा सत्ताधारी दल को मिल सकता है। अखिलेश यादव ने भी एक बयान में संकेत दिया कि मीडिया में दिख रही यह तल्खी एक रणनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है और समय आने पर दोनों दल मिलकर फैसला कर लेंगे।
इंडिया गठबंधन की आगामी शीर्ष बैठकों में उत्तर प्रदेश के सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की 150 सीटों की मांग वास्तव में मोलभाव (Bargaining) का हिस्सा है ताकि वह 70 से 80 सीटें हासिल कर सके, जबकि सपा 50 से 60 सीटों के आसपास मामले को समेटना चाहेगी। अगर दोनों दल व्यावहारिक रुख अपनाते हुए जिताऊ उम्मीदवारों पर सहमति बना लेते हैं तो गठबंधन बच जाएगा, लेकिन अगर दोनों में से कोई भी दल अपनी जिद पर अड़ा रहा, तो 2027 के चुनाव से पहले यह गठबंधन टूट के मुहाने पर भी पहुंच सकता है।