पुतिन पर ट्रंप की मेहरबानी से भड़के यूरोपीय देश, रूस पर लगाया 'महा-प्रतिबंध'; 1600 कंपनियों और लोगों पर सीधा वार
रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक भू-राजनीति में उस समय एक ऐतिहासिक दरार सामने आ गई जब अमेरिका और यूरोपीय सहयोगियों के रास्ते खुलकर अलग होते दिखे। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बढ़ते संवाद, द्विपक्षीय समझौतों और रूसी ईंधन पर नरमी बरतने के संकेतों से यूरोपीय संघ (EU) बेहद नाराज हो गया है। वॉशिंगटन द्वारा मॉस्को के प्रति दिखाए जा रहे इस 'नरम रुख' को यूरोपीय नेताओं ने पश्चिमी एकता और यूक्रेन के लिए बड़ा झटका माना है। अमेरिका के इस कदम के जवाब में यूरोपीय संघ ने जवाबी पलटवार करते हुए रूस पर अब तक का सबसे विशालकाय 'महा-प्रतिबंध' (Mega-Sanctions) लागू कर दिया है। लक्जमबर्ग में आयोजित यूरोपीय विदेश मंत्रियों की उच्चस्तरीय बैठक में रूस की युद्ध मशीनरी, बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम और ड्रोन सप्लाई चेन से जुड़े लगभग 1,600 व्यक्तियों और कॉरपोरेट कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने का कड़ा फैसला लिया गया है।
ट्रंप-पुतिन की नजदीकियों से क्यों तिलमिलाया यूरोप?
विवाद की जड़ में डोनाल्ड ट्रंप का वह हालिया रुख है, जिसमें उन्होंने घरेलू ईंधन कीमतों को काबू में करने और वैश्विक तेल बाजार को संतुलित करने के नाम पर मॉस्को के साथ सीधे समझौते का संकेत दिया। ट्रंप द्वारा पुतिन के साथ बातचीत को 'अत्यंत सफल' बताने और रूस पर लगे कुछ प्रतिबंधों में ढील देने की वकालत करने से फ्रांस, जर्मनी, पोलैंड और बाल्टिक देशों में भारी रोष फैल गया। यूरोपीय राजनयिकों का मानना है कि जब यूक्रेन अपनी संप्रभुता की लड़ाई लड़ रहा है और रूस लगातार मिसाइल हमले कर रहा है, तब अमेरिका का रूस के प्रति लचीला होना पूरे पश्चिमी मोर्चे (Transatlantic Alliance) की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने भी इसे पश्चिमी कमजोरी करार दिया था, जिसके बाद यूरोप ने खुद कड़ा मोर्चा संभालने का फैसला किया।
1600 कंपनियों और दिग्गजों पर गाज: युद्ध की रीढ़ तोड़ने की तैयारी
यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कल्लास (Kaja Kallas) ने घोषणा की कि यह युद्ध शुरू होने के बाद से ईयू की प्रतिबंध सूची का सबसे बड़ा एकल विस्तार है। इसके तहत लगभग 1,600 नए नामों को ईयू की काली सूची में जोड़ा गया है, जिससे कुल प्रतिबंधित संस्थाओं और लोगों की संख्या बढ़कर 4,600 के पार पहुंच गई है। इस बार निशाने पर सीधे तौर पर रूस का मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स है। इन प्रतिबंधों में रूस के हथियार निर्माता, ड्रोन असेंबल करने वाली फैक्ट्रियां, बैलिस्टिक मिसाइल के कलपुर्जे बनाने वाले कारखाने, लॉजिस्टिक्स कंपनियां और रूस के कब्जे वाले यूक्रेनी इलाकों में फर्जी चुनाव लड़ने वाले दर्जनों नेता शामिल हैं। इन सभी की संपत्तियां यूरोप भर में जब्त की जाएंगी और इन पर यूरोपीय देशों में किसी भी प्रकार का व्यापार करने या यात्रा करने पर पूर्ण पाबंदी होगी।
फ्रांस और जर्मनी का कड़ा संदेश: 'ट्रंप के समझौते हमें नहीं रोकेंगे'
फ्रांस के विदेश मंत्री ज्यां-नोएल बारो (Jean-Noël Barrot) सहित कई वरिष्ठ यूरोपीय नेताओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि वॉशिंगटन और मॉस्को के बीच चाहे कोई भी गुप्त या खुला समझौता क्यों न हो जाए, यूरोप का रुख जरा भी कमजोर नहीं होगा। बारो ने स्पष्ट किया कि यूरोप अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं को किसी तीसरे देश के चुनावी या राजनीतिक एजेंडे पर निर्भर नहीं छोड़ सकता। यूरोपीय संघ ने यह संदेश साफ कर दिया है कि अगर अमेरिका रूसी ऊर्जा और तेल पर अपनी पाबंदियां हटाता भी है, तब भी यूरोपीय संघ रूसी कंपनियों और जहाजों को अपने जलक्षेत्र, बीमा सेवाओं और बंदरगाहों से पूरी तरह बाहर रखेगा ताकि मॉस्को के युद्ध राजस्व पर लगाम कसी रहे।
पश्चिमी खेमे में सबसे बड़ी दरार और पुतिन की कूटनीतिक चाल
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति पुतिन के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत की तरह है। मॉस्को हमेशा से नाटो और पश्चिमी देशों के बीच फूट डालने की रणनीति पर काम करता रहा है। जहां एक ओर अमेरिका में ट्रंप धड़ा युद्ध को तुरंत रोकने के लिए रूस को आर्थिक रियायतें देने और बातचीत की मेज पर लाने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यूरोप खुद को अलग-थलग महसूस करते हुए और अधिक आक्रामक आर्थिक पाबंदियों की ओर बढ़ रहा है। इस टकराव से यूरोपीय संघ और अमेरिका के रक्षा व व्यापारिक संबंधों में अविश्वास की गहरी खाई पैदा हो गई है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर क्या होगा असर?
यूरोप के इस महा-प्रतिबंध से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chains) और ऊर्जा बाजार में फिर से हलचल मचने के आसार हैं। यदि अमेरिका रूसी तेल व डीजल के आयात को सुगम बनाता है और यूरोप उन पर प्रतिबंध और कड़े करता है, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में दोहरी व्यवस्था खड़ी हो जाएगी। इससे भारत, चीन और तुर्की जैसे तटस्थ देशों के लिए व्यापारिक रास्ते और जटिल हो सकते हैं। फिलहाल ब्रुसेल्स के इस कड़े कदम ने साबित कर दिया है कि अमेरिका के रुख में बदलाव के बावजूद यूरोपीय देश पुतिन के आगे किसी भी सूरत में झुकने को तैयार नहीं हैं।